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तो घट सकती है अपार्टमेंट में फ्लैटों की कीमत

Wed, 17 Jun 2015 11:56 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 17 Jun 2015 11:56 AM IST
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flat cost become less.

भूकंप के लिहाज से अति संवेदनशील उत्तराखंड की राजधानी में नए बायलाज ने सनसनी तो फैला दी है।

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इस निर्णय से बिल्डरों के चेहरे पर जहां खुशी दी है, वहीं मध्य वर्ग को अपना घर होने की उम्मीद भी दिखाई है। जानकार कहते हैं कि यदि सरकार ने बिल्डरों को रियायत दी है तो यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इसका फायदा आम लोगों को भी हो।

विशेषज्ञों के अनुसार, नए बायलाज से बिल्डरों के साथ ही मध्यम वर्ग के ग्राहकों को फायदा मिल सकता है। जमीन की आसमान छूती कीमतों का सीधा असर फ्लैटों की कीमत पर पड़ता है। लिहाजा अभी जहां चार से पांच मंजिल तक भवनों का निर्माण किया जा रहा था, अगर वहां 10 मंजिल तक भवन बनाए जाएंगे तो फ्लैटों की कीमत काफी हद तक कम हो सकती है।
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मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष आर मीनाक्षी सुंदरम बताते हैं कि नए बायजाल से शहर में मकानों की कमी दूर होगी। कम लागत में फ्लैट बनने से वह ग्राहकों को भी सस्ते में मिल सकेंगे। ऊंची कीमतों के कारण मध्यम वर्ग फ्लैट नहीं खरीद पा रहे थे। अब फ्लैट ज्यादा बनेंगे तो बिल्डरों में प्रतियोगिता तेज होगी जिसका फायदा ग्राहकों को मिलेगा।
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चार लाख परिवारों को चाहिए अपना घर

नगर निगम के हाउस टैक्स सर्वे के अनुसार, शहर में इस समय लगभग एक लाख भवन स्वामी हैं। जबकि शहर की जनसंख्या आठ लाख से ज्यादा है। लगभग साठ फीसदी परिवार मध्य वर्ग के हैं। इनमें भी अधिकतर किराये में रहते हैं।

नए बायलाज से बिल्डर तीन से पांच लाख रुपए तक भी कीमत कम करता है तो इसका फायदा निश्चित तौर पर इनको मिलेगा। बिल्डर व रियल इस्क्वायर कंपनी के एमडी कृति अग्रवाल ने बताया निश्चित तौर पर जब ज्यादा फ्लैट बनेंगे तो प्रतियोगिता होगी और फ्लैटों की कीमत पर बहुत फर्क पड़ेगा।

अभी फ्लैटों की कीमत
फ्लैट - क्षेत्र - कीमत लगभग में
एक बीएचके का फ्लैट - सहस्त्रधारा और हरिद्वार रोड - 20 से 25 लाख
दो बीएचके का फ्लैट - सहस्त्रधारा और हरिद्वार रोड - 40 से 65 लाख
तीन बीएचके का फ्लैट - सहस्त्रधारा और हरिद्वार रोड - 70 से 90 लाख
पेंट हाउस (पांच कमरे) - सहस्त्रधारा और हरिद्वार रोड - एक करोड़ से ऊपर

होना चाहिए स्कूल और अस्पताल

नए बायलाज में दस मंजिला अपार्टमेंट केवल शहर के उसी स्थान पर बन सकेंगे, जहां पर अस्पताल और स्कूल होंगे। 18 मीटर की सड़क भी अनिवार्य है। मसूरी के लिए 11 मीटर ऊंचाई और नैनीताल के लिए 7.5 मीटर की ऊंचाई तय की है।

नए बायलाज में प्रोजेक्ट को नदी से 30 मीटर की दूरी और 10 मीटर की दूरी पर जल स्रोत होने पर स्वीकृति मिलेगी। हालांकि सरकार की इस कार्रवाई पर पर्यावरणविदें ने चिंता जताई है।

ये भी हैं नए मानक

- 12 मीटर से चौड़ी सड़क होने पर चार मंजिला अपार्टमेंट
- 12 से 18 मीटर चौड़ी सड़क होने पर आठ मंजिला अपार्टमेंट
- 18 मीटर चौड़ी सड़क होने पर दस मंजिला अपार्टमेंट
- मसूरी में 11 मीटर और नैनीताल में 7.5 मीटर ऊंचा अपार्टमेंट
- नैनीताल में झील से तीस मीटर की दूरी अनिवार्य की गई है

मल्टीपल यूनिट के लिए 500 वर्गमीटर भूमि जरूरी
मल्टीपल यूनिट के फ्लैट के निर्माण के लिए पहले जहां 300 मीटर जमीन होनी अनिवार्य थी अब उसे बढ़ाकर 500 वर्गमीटर कर दिया गया है। स्टील पार्किंग को पहले निर्माण की ऊंचाई से जोड़ा जाता था, अब इसे अलग कर दिया है। पहले दो बेसमेंट बनाए जा सकते थे, अब तीन बनाए जा सकते हैं।

नगर एवं ग्राम्य नियोजन विभाग से छीनी जिम्मेदारी

नए बायलाज के मुताबिक विकास प्राधिकरण, विनियमित क्षेत्र और साडा से बाहर के भवनों के नक्शे अब राज्य विकास प्राधिकरण पास करेगा। पहले इसे नगर एवं ग्राम्य नियोजन विभाग पास करता था।

भूकंप नहीं, पर हरकत तो रोक सकते हैं

नए मानकों का पर्यावरणविद विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि नेपाल भूकंप से भी सरकार ने सबक नहीं लिया। पर्यावरणविद् डा. अनिल जोशी ने कहा कि सरकार भूकंप नहीं, लेकिन हरकत तो रोक सकती है। सरकार को तुरंत नए बायलाज को वापस लेना चाहिए।

किसी भी तकनीक से भवन निर्माण कर लें, लेकिन सात से ज्यादा रिक्टर का भूकंप आने पर सब फेल हो जाएगा। वैसे भी उत्तराखंड भूकंप के लिहाज से अति संवेदनशील है। ऐसे में सरकार का यह फैसला कतई उचित नहीं है।

भवन विशेषज्ञों ने बताया ठीक
भवन विशेषज्ञों के अनुसार अगर सही तकनीक का इस्तेमाल किया जाए तो 30 क्या 40 मंजिल तक भवन बनाए जा सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में भवन निर्माण क्षेत्र में ऊंचाई को फ्री रखा गया है। वहां पर भवन निर्माण से पहले जमीन का ट्रीटमेंट किया जाता है।


इस दौरान जमीन को इतना मजबूत कर दिया जाता है कि वह बड़ा से बड़ा भूकंप भी झेल सकती है। हिमाचल में पहाड़ी इलाकों तक में 15 मंजिल तक भवन बनाए जाते हैं। जापान, मलेशिया, उत्तरी और दक्षिण कोरिया के अलावा कई अन्य देशों में सात रिक्टर तक भूकंप आते रहते हैं, लेकिन वहां पर तकनीक के सहारे ऊंची इमारतें बनाई जाती हैं।

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