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नर्स की लापरवाही से गर्भस्थ शिशु की मौत
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 24 Jan 2016 10:12 AM IST
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देहरादून स्थित राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के दून महिला अस्पताल में उपचार नहीं मिलने से एक गर्भस्थ शिशु की मौत हो गई।
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परिजनों के हंगामे के बाद डॉक्टरों ने आनन-फानन में गर्भवती का ऑपरेशन कर भ्रूण को बाहर निकाला। परिजनों ने मामले में आरोपी डॉक्टर, नर्स और अन्य स्टाफ के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। दूसरी ओर, अस्पताल की सीएमएस डॉ. मीनाक्षी जोशी ने मामले की जांच के निर्देश दिए हैं।
चंदर रोड डालनवाला निवासी रीना को शुक्रवार को दून महिला अस्पताल लाया गया। रीना के पति विजय कुमार ने बताया कि प्रसव पीड़ा बढ़ने पर दोपहर में डॉक्टरों ने उसे भर्ती कर लिया। रात को पति व परिजन रीना को अस्पताल में छोड़कर घर चले गए। लेकिन एक महिला रीना की देखभाल के लिए अस्पताल में रुक गई।
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रात करीब साढ़े तीन बजे रीना ने बताया कि पेट में बच्चे की हलचल बंद हो गई है। इस पर परिजनों ने ड्यूटी पर तैनात नर्स को इसकी जानकारी दी। नर्स ने इसे सामान्य बात बताते हुए परिजनों को लौटा दिया। कुछ देर बाद परिजनों ने दोबारा नर्स को जानकारी देकर डॉक्टर को बुलाने की मांग की।
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परिजनों का आरोप है कि नर्स ने ना तो डॉक्टर को सूचना दी और ना ही खुद मरीज को देखने आई। उनके मिन्नत करने पर सुबह करीब साढ़े नौ बजे रीना को अल्ट्रासाउंड के लिए लाया गया।
अल्ट्रासाउंड के बाद डॉक्टरों ने बताया कि गर्भ में शिशु की मौत हो गई है। इसके बाद भी डॉक्टरों ने करीब दो घंटे तक रीना को उसी स्थिति में रहने दिया। परिजनों ने जब हंगामा किया तो करीब 11 बजे रीना का ऑपरेशन कर भ्रूण बाहर निकाला गया।
अगर परिजनों के आरोप सही हैं तो यह गंभीर लापरवाही है। मामले की जांच के निर्देश दिए गए हैं। जांच के बाद ही सही स्थिति का पता चल सकेगा।
- डॉ. मीनाक्षी जोशी, सीएमएस, दून महिला अस्पताल
मां ना पहाड़ में महफूज, ना मैदान में
उपचार नहीं मिलने के चलते गर्भस्थ शिशु की मौत का इकलौता मामला नहीं है। पिछले एक साल में करीब एक दर्जन से अधिक जच्चा-बच्चा उपचार नहीं मिलने के कारण दम तोड़ चुके हैं। दूरस्थ और दुर्गम ही नहीं राजधानी में भी उपचार नहीं मिलने के चलते लोगों को जान गंवानी पड़ी है। यह मामले प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल दशा बताने के लिए काफी हैं।
प्रदेश सरकार के तमाम दावों के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छुपी नहीं है। सरकारी अस्पतालों में एक तिहाई से भी कम डॉक्टर हैं। इसमें से बड़ी संख्या में चिकित्सक प्रशासनिक पदों पर बैठे हैं। पहाड़ के ज्यादातर अस्पताल बिना डॉक्टरों के चल रहे हैं।
डॉक्टरों का वितरण भी असमान तरीके से किया गया है। कहीं सर्जन तैनात हैं तो एनेस्थेटिस्ट नहीं हैं। ऐसे में लोगों को डॉक्टरों के तैनात होने का लाभ नहीं मिल पा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के नवीनतम सर्वे के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान केवल 11.5 फीसदी महिलाएं ही नियमित स्वास्थ्य जांच करवाती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह जरूरी सुविधाओं का उपलब्ध नहीं होना होता है।