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अब सीधे बैंक में जमा हो रहे हैं नकली नोट
प्रवेश कुमारी/मनमीत रावत, देहरादून
Updated Tue, 26 Nov 2013 08:08 AM IST
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नकली नोटों के धंधेबाजों ने मॉड आफ अप्रेंटिस (नोट चलाने का तरीका) बदल दिया है। वह छोटी रकम के सहारे अपना नेटवर्क फैला रहे हैं। बैंक वालों की मानसिकता का फायदा उन्हें खूब मिल रहा है।
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दरअसल, केवल बड़ी रकम को ही संदेह के दायरे में रखने के कारण अब नकली नोट चलाने वाले गिरोह बड़ी रकम का फ्रिक्शन कर बैंक में छोटी रकम जमा करा रहे हैं। ऐन इसी वक्त वह बैंक के बाहर स्थित एटीएम से असली नोट निकाल भी ले रहे हैं।
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इससे नकली नोट तुरंत मार्केट सर्कुलेशन में आ जा रहे हैं। मॉनिटरी सिस्टम को ध्वस्त करने की इस चाल की खबर पाने के बाद एसटीएफ ने इसके लिए शहर भर के सरकारी और गैर सरकारी बैंकों को चेताया है।
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अभी तक एक लाख से ऊपर ही नजर
असल में, अभी तक बैंक में जब एक लाख रुपए से ऊपर की रकम कोई जमा करता तो बैंक नकली नोटों का पड़ताल करते थे। बड़ी रकम के बीचों-बीच नकली नोट होते, जो पकड़ में आ जा रहे थे।
धंधेबाजों ने इसे भांपा और अब लाखों के बजाए महज दो से चार हजार रुपए की रकम बैंक में जमा करते है। दो हजार रुपए में पांच नोट जो सौ के होते हैं वह नकली होते हैं।
कम रकम होने के कारण बैंक शक नहीं करता। एसएसपी एसटीएफ अबुदेई सेंथिल ने बताया बैंक प्रबंधकों से बात की गई है।
गिरोह ने रूट में भी किया बदलाव
इसके अलावा इस धंधे में लगे गिरोह ने नकली नोट पहुंचाने के अपने रूट पर भी बदलाव कर दिया है। पहले जहां पाकिस्तान-नेपाल-दिल्ली होकर नकली नोट की खेप दून पहुंचती थी।
वहीं अब बांग्लादेश-मालदा या 24 परगना जिले होते हुए मुरादाबाद पहुंचती है। फिर वहां से उत्तराखंड-यूपी के भगतपुर बार्डर से नकली नोट उत्तराखंड पहुंचाए जाते हैं।
75 रुपए में बनता है 100 रुपए का नकली नोट
एसटीएफ अधिकारियों केअनुसार, पांच सौ रुपए केनकली नोट को बनाने केलिए 300 रुपए की लागत आती है। तस्कर इन रुपयों को भारत में फैले गैंग के नेटवर्क को 350 से 400 रुपए तक बेचते हैं।
बाकि का फायदा नकली नोट को चलन में लाने वाले नेटवर्क को मिलता है। इसी तरह 100 रुपए का नोट 75 रुपए में बनता है। जबकि एक हजार रुपए केनोट की लागत 700 रुपए आती है।