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Uttarakhand: स्नो ब्लाइंडनेस...बर्फ की चमक से क्षतिग्रस्त हो रहा आंख का पर्दा, ITBP के जवान भी जूझ रहे

Tue, 25 Mar 2025 10:38 AM IST
रेनू सकलानी अंकित यादव, संवाद न्यूज एजेंसी, देहरादून
अंकित यादव, संवाद न्यूज एजेंसी, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Tue, 25 Mar 2025 10:38 AM IST
सार

पर्यटकों और स्थानीय लोगों के साथ ही आईटीबीपी के जवान भी स्नो ब्लाइंडनेस की चपेट में आ रहे हैं। दून अस्पताल और श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में हर महीने करीब पांच मरीज आ रहे हैं।

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Snow Blindness Eyelid is getting damaged due to snow shine ITBP soldiers are also troubled Uttarakhand news
आईटीबीपी जवान (फाइल फोटो) - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

बर्फीले क्षेत्राें में रहने वाले लोगों को आंख संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। पर्यटक और वहां पर तैनात सेना के जवानों को भी दिक्कतें हो रही हैं। बर्फ की चमक से उनकी आंखों के पर्दे को क्षति पहुंच रही है। इससे धीमे-धीमे उनकी नजर में धुंधलापन देखने को मिल रहा है।

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राजकीय दून मेडिकल कॉलेज और श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में पर्वतीय क्षेत्रों से हर माह करीब पांच मरीज आ रहे हैं। जो स्नो ब्लाइंडनेस की समस्या से जूझते हैं। पहाड़ों में जाकर बर्फ देखना और उससे खेलना सबको अच्छा लगता है। लेकिन, सावधानी न बरती जाए तो इससे दिक्कतें भी हो जाती हैं।
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हर माह एक मरीज 
श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. रिजवी के अनुसार उनके पास स्नो ब्लाइंडनेस की समस्या से जूझ रहे हर माह करीब तीन से चार मरीज आते हैं। दून मेडिकल कॉलेज में भी इस तरह का हर माह एक मरीज देखने को मिलता है।
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इसके ज्यादातर मामले चकाराता, धनोल्टी, चमोली, उत्तरकाशी, मुनस्यारी, दारमा घाटी, नीती घाटी समेत ऊंचाई वाले बर्फीले इलाकों से सामने आते हैं। इसमें यहां के स्थानीय लोग तो शामिल हैं हीं, साथ ही पर्यटक और यहां पर ड्यूटी करने वाले सेना के जवान भी इसके शिकार हो रहे हैं।
 

पराबैगनी किरणों के परावर्तन से प्रभावित हो रहा आंखों का पर्द
दून मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग के चिकित्सक डॉ. सुशील ओझा बताते हैं कि बर्फ में सूर्य की किरणें समाहित नहीं हो पाती हैं। ऐसे में वे परावर्तित होकर सीधे वहां मौजूद लोगों की आखों में जाती हैं। इससे पहले तो फोटो रिसेप्टर फिर बाद में आंख के पर्दे का शेष का हिस्सा प्रभावित होता है। इससे नाखूना (आंख के सफेद हिस्से पर मांस चढ़ना) का खतरा बढ़ता है।चिकित्सकों के मुताबिक मनुष्य की आंख में 0.5 सेंटीमीटर का मैक्यूला मौजूद है। जब पराबैगनी किरणें परावर्तित होकर मैक्यूला को क्षति पहुंचाती है, तो इससे पीड़ित की 80 प्रतिशत तक रोशनी चली जाती है।



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400 से 700 नैनो मीटर वेवलेंथ की रोशनी आखों के लिए सहज
चिकित्सक डॉ. रिजवी के मुताबिक आंखों के लिए 400 से 700 नैनो मीटर वेवलेंथ की रोशनी काफी सहज मानी जाती है। इससे कम और ज्यादा वेवलेंथ की रोशनी आंखों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
 

बचाव के उपाय
1- 6 से 8 घंटे की नींद लेना जरूरी है।
2- शरीर में विटामिन-ए की मात्रा बढ़ाएं।

3- काले अंगूर का सेवन करें।
4- धूप में सनग्लास का इस्तेमाल करें।

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