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उत्तराखंड: सुरंग में विस्फोट से 400 मीटर तक कांपते हैं आसपास के पहाड़, वैज्ञानिक जता रहे चिंता, दिए ये सुझाव

Tue, 10 Sep 2024 08:10 AM IST
रेनू सकलानी अंकित गर्ग, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अंकित गर्ग, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Tue, 10 Sep 2024 08:10 AM IST
सार

सही तकनीक के अभाव में विस्फोटक की 50 प्रतिशत ऊर्जा पत्थरों को न तोड़कर बाहर की तरफ प्रवाहित हो जाती है। तकनीक के इस्तेमाल से 300 मीटर तक कंपन का दायरा  घटाया जा सकता है।

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Explosion in the tunnel causes the surrounding mountains to tremble up to 400 meters Uttarakhand News in hindi
प्रतीकात्मक - फोटो : ANI

विस्तार

सुरंग और सड़क आदि के निर्माण में पहाड़ को काटने और भेदने के लिए जब विस्फोट किया जाता है तो उससे 400 मीटर दूर तक के पहाड़ कांपते हैं। सही तकनीकी के अभाव में विस्फोट की 50 प्रतिशत ऊर्जा पत्थरों को तोड़ने के बजाय बाहर की तरफ जाकर बर्बाद जाती है। वैज्ञानिक पहाड़ों की सुरक्षा के लिए शॉक कंट्रोल आधारित नोनल डेटोनेशन सिस्टम का प्रयोग कर इस कंपन को काफी हद तक कम किए जाने की पैरवी कर रहे हैं।

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पहाड़ी राज्यों के विकास के लिए संचालित विभिन्न परियोजनाओं में पहाड़ों को काटने और भेदने के लिए बड़ी मात्रा में विस्फोटकों का इस्तेमाल हो रहा है। वहीं दूसरी ओर, पहाड़ों पर जगह-जगह भूस्खलन, भू-धंसाव के साथ मकानों की दीवारों, छतों और फर्श आदि में दरारें आ रही हैं। पिछले साल जोशीमठ में इस तरह की घटनाएं देखने को मिली थीं। इसके बाद कई घरों को खाली कराना पड़ा था।
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इसी तरह हाल ही में बागेश्वर जिले में भी दो दर्जन से अधिक घरों में दरारें आ गई थीं। इन घटनाओं ने पहाड़ पर रह रहे लोगों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ऐसे में जहां-जहां आपदा के चिह्न भवनों और पहाड़ों में दरारों के रूप में सामने आ रहे हैं, वहां लोग निर्माण में इस्तेमाल किए जा रहे विस्फोटकों को जिम्मेदार बताते रहे हैं। हालांकि, परियोजना से जुड़े अधिकारी विस्फोट से पहाड़ को किसी तरह के नुकसान होने की आशंका से इन्कार करते रहे हैं।
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400 मीटर तक पहाड़ प्रभावित
पहाड़ों में टनल निर्माण की तकनीकी को लेकर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी में पहुंचे आईआईटी पटना के निदेशक प्रो. टीएन सिंह ने बातचीत में बताया कि टनल के निर्माण के दौरान किए जाने वाले विस्फोट से करीब 400 मीटर तक पहाड़ प्रभावित होते हैं।

हालांकि यह दूरी कम या ज्यादा हो सकती है, जो पहाड़ की स्थिरता और मजबूती पर निर्भर करती है। उन्होंने बताया कि विस्फोटक को सही जगह और स्थिति में रखे जाने से इसे कम करने का प्रयास किया जाता है। लेकिन, विस्फोट के लिए नोनल डेटोनेशन सिस्टम का इस्तेमाल होना चाहिए, जो कंपनी और ध्वनि को एक तरह से सोखता है। इससे कंपन की दूरी 100 मीटर तक सीमित रह जाती है।

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25 से 50 मिली सेकंड के अंतर पर करता है ध्वनि को नियंत्रित

प्रो. टीएन सिंह ने बताया कि नोनल तकनीक के सिस्टम में छोटे-छोटे छेद होते हैं, जो 25 से 50 मिली सेकंड के अंतर पर विस्फोट से होने वाली ध्वनि को नियंत्रित करता है। इसका राइफल आदि निर्माण में भी उपयोग किया जाता है।


 

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