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'अंधेरे' में हो रहा जैव विविधता का करोड़ों का दोहन
रजा शास्त्री / अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 19 Sep 2016 09:12 AM IST
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हिमालय
- फोटो : gettyimages
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उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्र की बेशकीमती जैव विविधता का दोहन ‘अंधेरे’ में हो रहा है।
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जैव विविधता राज्य नियमावली के न बन पाने से यह पता ही नहीं चल पा रहा है कि कितनी कीमत की जड़ी-बूटियां और दूसरी इको सिस्टम सर्विसेस का जंगलों से दोहन हो रहा है। वन संपदा के दोहन पर जो धनराशि वन पंचायतों को नियम के तहत मिलनी चाहिए, वह भी नहीं मिल रही है। इसके साथ ही वनों में संपदा दोहन की क्षतिपूर्ति भी नहीं हो पा रही है। इस संबंध में एनजीटी ने दिशा निर्देश भी जारी किए हैं।
केंद्र से मिलने वाली धनराशि के लिए शासन ने जैव विविधता अधिनियम-2002 लागू करने की खानापूरी तो कर दी है लेकिन राज्य नियमावली अभी तक तैयार नहीं हो पाई है। इससे नुकसान प्रदेश की वन पंचायतों और वनों को हो रहा है। दिखाने के लिए कुछ स्थानों पर जैव विविधता प्रबंध समितियों का गठन भी कर दिया गया, लेकिन नियमावली न होने से इनके काम करने की प्रक्रिया और व्यवस्था स्पष्ट नहीं है। इससे वन संपदा के करोड़ों के दोहन की धनराशि का हिस्सा वन पंचायतों को नहीं मिल रहा है।
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तरीका यह है कि वन संपदा के दोहन के पहले क्रेता को संबंधित वन पंचायत की जैव विविधता प्रबंध समिति से अनुमति लेनी पड़ती है। उसके बाद जितनी संपदा के दोहन का करार होता है उस हिसाब से वन पंचायत को क्रेता पैसा देता है। उत्तराखंड में पेड़ काटकर बेचने का काम वन निगम करता है।
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क्रेता से मिलने वाले पैसे का 95 फीसदी जैव विविधता समिति को जाता है और इसमें 5 फीसदी धनराशि जैव विविधता बोर्ड के हक में आती है। राज्य नियमावली न बन पाने से अधिकांश स्थानों पर जैव विविधता समितियों का गठन नहीं हो पाया है, लेकिन वन संपदा का दोहन जारी है जिससे वन पंचायतों का हक मारा जा रहा है। इसके साथ ही क्षतिपूरक कार्य नहीं हो पा रहे हैं जिससे जंगलों को नुकसान हो रहा है।
एनजीटी में सुनवाई 29 सितंबर को
- प्रदेशों में जैव विविधता एक्ट ढंग से लागू न किए जाने पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) में याचिका दाखिल की गई है। इसमें एक बार एनजीटी सख्ती से आदेश जारी कर चुका है। प्रदेश में एक्ट लागू तो है लेकिन राज्य नियमावली के न बनाने से राज्य भी कटघरे में आ जाएगा। 17 सितंबर की सुनवाई में एनजीटी ने नोटिस भी जारी किया था। अब मामले की सुनवाई 29 सितंबर को होनी है।
सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा तय नहीं
- वन संपदा के दोहन का लेखा-जोखा तय न होने से सकल घरेलू उत्पाद में वन सेक्टर की धनराशि तय नहीं हो पा रही है। भारतीय वन सर्वेक्षण के उप निदेशक प्रकाश लखचौरा के मुताबिक जंगलों के अंदर और बाहर की संपदा के दोहन का रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। जंगलों से कितना लिया जाता है और इसके एवज में क्या दिया जा रहा है। इसका रिकार्ड व्यवस्थित किए जाने की जरूरत है।