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एक्सक्लूसिव: उत्तराखंड के 85 प्रतिशत जिले बाढ़ और भूस्खलन के हॉट स्पॉट, नौ लाख से ज्यादा लोगों को खतरा

Sun, 21 Feb 2021 10:33 AM IST
अलका त्यागी राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 21 Feb 2021 10:33 AM IST
सार

  • ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद के विश्लेषण में हुआ खुलासा
  • उत्तराखंड में चार गुना हो गई बाढ़ की घटनाएं, नौ लाख से अधिक लोगों पर बना रहता है बाढ़ का खतरा
  • पिछले 20 सालों में राज्य ने 50 हजार हेक्टेयर फारेस्ट कवर खो दिया है, शीतकाल में सूखे के भी बनें हालात

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Exclusive: Uttarakhand 85 percent districts under  flood and landslide hot spots
बाढ़ - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

चमोली जिले की ऋषिगंगा में आई भीषण बाढ़ से चर्चाओं में आए उत्तराखंड में 1970 से बाढ़ घटनाएं चार गुना बढ़ गई हैं। राज्य के 85 प्रतिशत जिले बाढ़ और भूस्खलन के हॉट स्पॉट बने हैं। पिछले दो दशक में 50 हजार हेक्टेयर फारेस्ट कवर इन प्राकृतिक आपदाओं की भेंट चढ़ गया है। इसका कुप्रभाव स्थानीय जलवायु में बदलाव के रूप में सामने आया है जो बादल फटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ की बढ़ती घटनाओं की वजह बना है।

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यह खुलासा ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (सीईईडब्ल्यू) के स्वतंत्र विश्लेषण में सामने आया है। काउंसिल की रिपोर्ट बता रही है कि उत्तराखंड में 85 प्रतिशत जिले अत्यधिक बाढ़ की चपेट में हैं। इनमें चमोली, नैनीताल, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, हरिद्वार सबसे अधिक प्रभावित हैं।
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1970 से बाढ़ की घटनाओं में चार गुना वृद्धि हुई है। इससे अत्यधिक जानमाल की हानि हुई है। जो 85 प्रतिशत से अधिक जिले  बाढ़ को लेकर संवेदनशील की श्रेणी में हैं, उनमें करीब नौ लाख से अधिक लोगों के घर हैं। एक तरह से ये जिले अत्यधिक बाढ़ और इससे संबंधित घटनाओं के हॉट स्पॉट हैं।

दो गुना बढ़ गया सूखा
परिषद के अध्ययन के मुताबिक, उत्तराखंड में 1970 के बाद से सूखा दो गुना बढ़ गया था।  राज्य के 69 प्रतिशत से अधिक जिले इसकी चपेट में थे। साथ ही पिछले एक दशक में अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़ जिलों मे बाढ़ और सूखा एक साथ आया। 

शीतकाल में सूखे के हालात भी रहे

-वर्ष 2006 में शीतकालीन वर्षा की कमी से राज्य के 11 जिलों व छह तहसीलों में सूखा, 50 प्रतिशत अधिक फसल प्रभावित।
-वर्ष 2008 में सर्दियों में सूखा, नौ जिलों की 45 तहसीलों के 10,482 गांवों में 50 प्रतिशत फसल चौपट हो गई।
-वर्ष 2009  में सर्दियों में सूखा, 10 जिलों में 57 तहीसलों में सूखे की स्थिति (स्रोत: हिमालय और आपदा जोखिम न्यूनीकरण)।
-1970 के बाद से बाढ़ व भूस्खलन की बड़ी घटनाएं।
- मई 1968 में धौलीगंगा-ऋषिगंगा के संगम के भूस्खलन झील बन गई थी, जिससे तपोवन में भारी नुकसान।
-20 जुलाई 1970 में अलकनंदा घाटी में भारी बाढ़ से बेलाकूची, चमोली व श्रीनगर में भारी तबाही।
-छह व 10 अगस्त में झील से हुए रिसवा से जोशियाड़ा सहित तट पर स्थित कई स्थानों में भारी क्षति।
-दो सितंबर 1978 रुपनि-सुपिन व पब्बर सहित में पानी का भारी जलसंग्रह से यमुना में बाढ़, 272 लोगों की मौत।
-1979 में ऊखीमठ में भूस्खलन से 39 लोग मारे गए।
-1998 मध्य महेश्वर व काली गंगा घाटियों में भूसख्लन से  भेंटी व पौंडा गांव मलबे में दबे, 101 मारे गए।
- 18 अगस्त 2003 भारत नेपाल सीमा पर काली घाटी में भूस्खलन से 250 से अधिक लोग मारे गए।
-2010 में बाल्टा, देवली, सुगढ़, स्यानचट्टी, डाबारकोट में भारीत तबाही, कई लोग मारे गए।
-2012 रुद्रप्रयाग के किमाणा व गिरिया में भूस्खलन से 69 लोगों की मौत।
2012 में उत्तरकाशी के असी गंगा में भूस्खलन से पानी रुका, बाढ़ आई और 32 लोगों की जान चली गई।
-2013 उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ़ में बाढ़ से भारी नुकसान, केदारनाथ में 4000 लोगों की मौत।
-04 अगस्त 2017 में कोटद्वार शहर में बाढ़ से छह लोगों की मौत, 350 से अधिक प्रभावित परिवार।
-202 में ऋषिगंगा में बाढ़ से 203 लोगों की मौत या लापता।
(स्रोत : हिमालय और आपदा जोखिम न्यूनीकरण)

उत्तराखंड में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ इस बात का सबूत है कि जलवायु संकट को अब नजरांदाज नहीं किया जा सकता। पिछले 20 सालों में उत्तराखंड ने 50 हजार हेक्टेयर से अधिक फारेस्ट कवर खो दिया है। भूमि उपयोग आधारित वृक्षारोपण पर ध्यान देने से न केवल जलवायु असंतुलन को दूर किया जा सकता है बल्कि राज्य में स्थायी पर्यटन को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है।
-अविनाश मोहंती, प्रोग्राम लीडर, सीईईडब्ल्यू

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, तापमान में वृद्धि के कारण उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ रहा है। इससे बार-बार फ्लैश फ्लड आ रहा है। आने वाले सालों में यह राज्य में चल रही 150 करोड़ लागत की प्रमुख बुनियादी संरचना से जुड़ी परियोजनाओं को प्रभावित कर सकता है।
-अरुणाभ घोष,  कार्यकारी अधिकारी, सीईईडब्ल्यू

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