एक्सक्लूसिव: राजाजी टाइगर रिजर्व में हुआ बाघ-बाघिन का मिलन, नहीं हुई कोई हिंसक झड़प
- नए वन क्षेत्र में विचरण कर अपनी टेरिटरी बना रही पार्क में लाई गई बाघिन
- पार्क क्षेत्र में बाघ-बाघिन की पहली मुलाकात में नहीं हुई कोई हिंसक झड़प
- बाघिन को कॉलर आईडी फिर से लगाने के लिए ली जाएगी विशेषज्ञों की राय
विस्तार
कुछ समय पूर्व कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से राजाजी टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित किए गए दो बाघों के बीच शांतिपूर्ण माहौल में मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया है। वे पश्चिमी हिस्से के नए प्राकृतिकवास के 532 वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल में विचरण कर रहे हैं। उत्तराखंड के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक, वन्यजीव विनोद कुमार सिंघल ने महत्वाकांक्षी बाघ स्थानांतरण परियोजना को सफल बताते हुए कहा कि आने वाले समय में परियोजना को सही समय पर आगे बढ़ाया जाएगा। वहीं, बाघों पर निगरानी के लिए राजाजी पार्क में 100 ट्रैप कैमरा लगाए गए हैं।
सिंघल ने बताया कि रेडियो कॉलर छोड़कर मोतीचूर रेंज के अपने बाडे़ से निकलने के बाद बाघिन ने कई दिन तक पनियाला के जंगल में ही डेरा डाला और शिकार किया। इसके बाद वह धौलखंड रेंज होते हुए चिल्लावाली रेंज से देहरादून वन प्रभाग की आशारोड़ी रेंज से घूमते हुए वापस धौलखंड रेंज की ओर रुख कर गई।
उन्होंने बताया कि बाघ प्रजाति के वन्यजीव अपनी सहज प्रवृत्ति के चलते अपनी टेरिटरी या क्षेत्र तय करने से पहले इसी तरह अपने प्राकृतिकवास में विचरण करते हैं। इसके साथ ही वे अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जरूरी संसाधनों की प्रचुर उपलब्धता को परखते हैं। स्थानांतरित किए गए बाघ व बाघिन का राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी छोर के जंगल में व्यापक रूप से घूमना इसी सहज प्रवृत्ति का हिस्सा है।
सिंघल ने बताया कि पिछले सप्ताहभर जंगल में शिकार करते हुए बाघ की शांतिपूर्ण तरीके से बाघिन से भी मुलाकात होने की सूचना मिली है। उन्होंने बताया कि बाघों में मुलाकातें झड़प के साथ होती हैं, जिसे टेरिटोरियल फाइट कहा जाता है, ऐसा वे अपनी सीमा निर्धारित करने के लिए करते हैं। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ।
यहां दोनों बाघों की मुलाकात के दौरान कोई झड़प नहीं हुई। उन्होंने बताया कि राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी छोर के 532 वर्ग किलोमीटर के जंगल का प्राकृतिकवास बहुत समृद्ध है, जिसमें वन्यजीवों के लिए आदर्श स्थितियां हैं यानि खाना, पानी और रहने के स्थान प्रचुरता से उपलब्ध हैं।
कॉलर आईडी पुन: लगाने पर ली जाएगी विशेषज्ञों की राय
उत्तराखंड के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक, वन्यजीव विनोद कुमार सिंघल ने बताया कि रेडियो कॉलर छोड़कर मोतीचूर रेंज के अपने बाडे़ से निकलने के बाद बाघिन पार्क के पश्चिमी हिस्से में विचरण कर रही है। बाघिन को पुन: कॉलर आईडी लगाई जाएगी या नहीं के सवाल पर सिंघल ने बताया कि इस विषय में विशेषज्ञों से राय ली जा रही है। ऐसा करने के लिए बाघिन को पुन: ट्रेंक्यूलाइज करना पड़ेगा। यह कितना सही और सुरक्षित रहेगा, इस पर विशेषज्ञों की राय के बाद ही कुछ फैसला लिया जाएगा।
दो अन्य बाघों के पुनर्वास में लग सकता है समय
कॉर्बेट से राजाजी टाइगर रिजर्व में दो और बाघों के प्रस्तावित पुनर्वास में कुछ और समय लग सकता है। एनटीसीए के डीआईजी (वन) सुरेंद्र मेहरा ने एक पत्र के माध्यम से राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा उत्तराखंड वन विभाग को यह जानकारी दी है।
मेहरा के मुताबिक कॉर्बेट और राजाजी के पश्चिमी भाग के निवास स्थान 19 किमी रेलवे पटरियों का बड़ा अंतर है। मेहरा के मुताबिक जब तक दोनों स्थानांतरित बाघ अपने बदले हुए परिवेश से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो जाते, तब तक इलाके में गहन गश्त और सतर्कता बरतने की जरूरत है। तब तक राजाजी में नए सिरे से कैमरों का जाल, उनके मल और पग के निशान की वैज्ञानिक परीक्षा के माध्यम से उनके स्थान की निरंतर निगरानी रखी जा सकती है।