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एक्सक्लूसिव: ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग पर सुरंगों के लिए अब होगा चट्टानों की मजबूती का अध्ययन

Mon, 01 Feb 2021 05:50 PM IST
अलका त्यागी संदीप थपलियाल, अमर उजाला, श्रीनगर(पौड़ी)
संदीप थपलियाल, अमर उजाला, श्रीनगर(पौड़ी) Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 01 Feb 2021 05:50 PM IST
सार

  • ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग में बननी हैं 17 सुरंग
  • विद्युत चुंबकीय सर्वेक्षण शुरू, श्रीनगर में बना बेस कैंप

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Exclusive: Study Strength of Rocks will now be done for tunnels on Rishikesh-Karnprayag rail route
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेललाइन - फोटो : ट्वीटर

विस्तार

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग का हेलीबोर्न ट्रांजिएंट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वेक्षण शुरू हो गया है। इस प्रणाली से प्रस्तावित रेल मार्ग के विद्युत चुंबकीय भू भौतिकी का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि धरती के अंदर चट्टानों की स्थिति और प्रकृति की जानकारी हासिल हो सके।

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आरवीएनएल (रेल विकास निगम लिमिटेड) ने सीएसआईआर-एनजीआरआई (राष्ट्रीय भू-भौतिकीय अनुसंधान संस्थान) हैदराबाद को इस सर्वेक्षण का जिम्मा दिया है। संस्थान के अनुसार 10 से 15 दिनों के भीतर ऋषिकेश से कर्णप्रयाग के बीच यह सर्वेक्षण कर लिया जाएगा।
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125.20 किलोमीटर लंबे ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग का लगभग 84.24 प्रतिशत भाग 17 सुरंगों से गुजर रहा है। पूरे रेल मार्ग में 105.47 किलोमीटर सुरंग हैं। आरवीएनएल मार्ग में आने वाले पहाड़ों का पहले ही जियोग्राफिकल सर्वेक्षण करा चुका है, लेकिन कई ऐसे स्थान हैं, जहां जमीनी सर्वेक्षण संभव नहीं है। इसे देखते हुए संपूर्ण मार्ग का एयरबोर्न विद्युत चुंबकीय सर्वेक्षण कराया जा रहा है।
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एनजीआरआई के निदेशक डा. वीरेंद्र मणि तिवारी की अगुवाई में सर्वेक्षण शुरू हो गया है। इसके लिए रेलमार्ग के लगभग मध्य मेें आने वाले श्रीनगर शहर में बेस कैंप बनाया गया है। हेलीकॉप्टर से हेलीबोर्न ट्रांजिएंट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वेक्षण किया जा रहा हैै।

इसके लिए हेलीकॉप्टर से रस्सों के सहारे सेंसर जोड़ा गया है। यह हेलीकॉप्टर प्रस्तावित रेल मार्ग के ऊपर सेंसर लेकर उड़ेगा। उन्होंने बताया कि विशालकाय हेलीबोर्न ट्रांजिएंट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रणाली में लूप से विद्युत चुंबकीय क्षेत्र पैदा किया जाता है। इससे धरती के विद्युत चुंबकीय प्रकृति का मापन किया जाता है, जो  पहाड़ की प्रकृति की जानकारी हासिल करने का माध्यम है।


इसके बाद सेंसर से मिले आंकड़ों का भूगर्भीय आधार पर विश्लेषण किया जाता है। डाटा मिलने से जानकारी मिल जाती है कि किसी पहाड़ मेें फ्रैक्चर्ड रॉक है कि नही। फॉल्ट किधर से गुजर रहा है, साथ ही यदि किसी स्थान पर पानी का रिसाव हो रहा है तो उसकी भी जानकारी मिल जाती है।  उन्होंने बताया कि डाटा विश्लेषण के आधार पर आरवीएनएल को सुझाव भी दिए जाएंगे। जहां चट्टान सुरक्षित न हो, वहां इसका विकल्प क्या हो सकता है, यह भी देखा जा रहा है।

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