एक्सक्लूसिव: उत्तराखंड में बाघ के मैदान से पहाड़ पहुंचने वाले इलाकों का चला पता
- कुमाऊं में वन विभाग और डब्ल्यूआईआई कर रहे अध्ययन
- वन्यजीव कॉरिडोर की स्थिति भी मिली संतोषजनक
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बाघ के बेहद ऊंचाई वाली रेंज अस्कोट (पिथौरागढ़ ) तक पहुंचने के वैज्ञानिक साक्ष्य मिल चुके हैं, लेकिन बाघ किन रास्तों का इस्तेमाल कर तराई- भाबर से पहाड़ चढ़ रहे हैं, इसका अब तक केवल अंदाजा था, कोई साक्ष्य नहीं मिला था। अब बाघ तराई-भाबर से किन रास्तों का इस्तेमाल कर पहाड़ पहुंच रहे हैं, उससे जुड़े कुछ इलाकों का एक अध्ययन में पता चला है।
डिस्परसल कम्युनिकेशन एंड कंजरवेशन स्टडीज फॉर टाइगर इन कुमाऊं हिमालय अध्ययन के जरिये वन विभाग और वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को नैनीताल और चंपावत जिले में कुछ ऐसे इलाकों का पता चला है जिनका इस्तेमाल कर बाघ नैनीताल, बेतालघाट, अल्मोड़ा वन प्रभाग के जंगल से लेकर चंपावत की पहाड़ियों में पहुंच रहे हैं। इस अध्ययन में वन्यजीव कॉरिडोर में बाघ के मूवमेंट, वास स्थल की स्थिति जैसे बिंदुओं को भी शामिल किया गया है, जिसमें कॉरिडोर की स्थिति भी संतोषजनक मिली है।
2016 में बाघ के अस्कोट में पहुंचने के कैमरा ट्रैप के माध्यम से फोटो मिली थी। इसके बाद वन विभाग ने पहाड़ में बाघ के पहुंचने वाले रास्तों के बारे में पता करने की योजना बनाई। इसी क्रम में कुमाऊं में अध्ययन शुरू किया गया। अंतरराष्ट्रीय जू के पूर्व उप निदेशक और प्रोजेक्ट इंचार्ज जीएस कार्की कहते हैं कि अध्ययन में नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी का प्रोटोकाल( ट्रांजेक्ट एक्सरसाइज) है, उसका पालन करते हुए अध्ययन किया जा रहा है। इसमें कुछ इलाकों के बारे में पता चला है, जिसका इस्तेमाल कर बाघ पहाड़ चढ़ रहे हैं। अभी यह अध्ययन चल रहा है।
इन जगहों का चला पता
नैनीताल जनपद में बौर वैली से बाघ देचौरी रेंज से होते हुए पंगूट (नैनीताल) पहुंच रहे हैं। इसी तरह दाबका वैली से विनायक (नैनीताल), मोहान- कुनखते से बेतालघाट और अल्मोड़ा वन प्रभाग के जंगल में पहुंच रहे हैं। चंपावत जिले में चंपावत की पहाड़ियों (बूम के पास से) में पहुंचने वाले इलाकों का पता चला है।
कॉरिडोर की स्थिति संतोषजनक मिली
जंगल आपस में कॉरिडोर के जरिए जुड़े हैं। इनसे ही वन्यजीव आवागमन करते हैं। अभी तक वन विभाग के पास करीब ढाई दशक पुराने कॉरिडोर के संबंध में ही जानकारी थी, पर इन सालों में कॉरिडोर किस हालात में हैं, क्या टाइगर समेत दूसरे वन्यजीव इनका इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर नए कॉरिडोर बन गए हैं, कॉरिडोर और आसपास का वास स्थल कैसा है और इन जगहों पर फूड चेन कैसी है, इसके बारे में कोई नई रिपोर्ट वन विभाग के पास नहीं थी।
ऐसे में वन विभाग ने टाइगर कॉरिडोर को केंद्र में रखकर जंगलों को जोड़ने वाले कॉरिडोर का अध्ययन किया है। प्रोजेक्ट इंचार्ज कार्की कहते हैं कि कुमाऊं के कॉरिडोर के अलावा नेपाल और यूपी सीमा के पास स्थित कॉरिडोर का कैमरा ट्रैप आदि के माध्यम से अध्ययन किया गया है। इसमें पता चलता है कि बाघ इन कॉरिडोर का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। मूवमेंट में निरंतरता है। इन जगहों पर वास स्थल भी बढ़िया हैं। बाघ का भोजन हिरन, जंगली सूअर आदि होता है, इनकी भी उपलब्धता है। हिरन समेत अन्य शाकाहारी जानवरों को खाने के लिए भी संबंधित जगहों पर वनस्पति भी पर्याप्त मात्रा में है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने की योजना में मदद
जहां पर टाइगर कॉरिडोर हैं, उनके आसपास के क्षेत्रों में मानव आबादी और मानव- वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं के संबंध में भी जानकारी जुटाई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे संघर्ष को कम करने वाली योजनाओं को बेहतर ढंग से बनाने और लागू करने में मदद मिलेगी। अध्ययन रिपोर्ट को मार्च तक सौंपने का लक्ष्य है।
इन कॉरिडोर का अध्ययन हो रहा है
- साउथ पाटी दून-चिल्किया
- चिल्किया- कोटा
- ढिकुली- गर्जिया
- मलानी- कोटा
- फतेहपुर-गदगदिया (निहाल- भाखड़ा)
- गौला रोखड़- गोराई टांडा
- किलपुरा-खटीमा- सुरई
- नखाताल-नेपाल कॉरिडोर
- बूम
- कड़ापानी-सिडकुल
- बौर- दाबका रिवर अपस्ट्रीम कैचमेंट
वन विभाग के पास वन्यजीव कॉरिडोर को लेकर हाल के सालों में तैयार की गई कोई भी रिपोर्ट नहीं है। ऐसे में कॉरिडोर लेकर भी अध्ययन कराने का फैसला किया गया था। इसमें भी कॉरिडोर कितने फंक्शनल रह गए हैं, उनका आने वाले समय में भविष्य क्या होगा, इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखकर अध्ययन कराया जा रहा है। जो जानकारी सामने आ रही है, उसमें कॉरिडोर ठीक स्थिति में मिले हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर मानव-वन्यजीव संघर्ष को भी कम करने में मदद मिलेगी। पहाड़ में किन रास्तों से बाघ पहुंच रहे हैं, उसका भी पता लगाया जा रहा है, यह राज्य का अपने तरह का पहला अध्ययन है।
-डॉ. पराग मधुकर धकाते, सीसएफ वन मुख्यालय व विशेष सचिव मुख्यमंत्री
वन्यजीव कॉरिडोर को लेकर अध्ययन किया जा रहा है। इसमें वास स्थल, फूड चेन समेत सभी पहलुओं को शामिल किया गया है। एनटीसीए के प्रोटोकाल के तहत कैमरा ट्रैप लगाकर अध्ययन हो रहा है। पहाड़ में बाघ के पहुंचने के इलाकों का पता लगाने की भी कोशिश हो रही है, ऐसे कुछ इलाकों के संकेत मिले हैं। काम अंतिम चरण में है। संभावना है कि मार्च तक अध्ययन रिपोर्ट तैयार कर सौंप दी जाएगी।
-जीएस कार्की, प्रोजेक्ट इंचार्ज व पूर्व उप निदेशक