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Uttarakhand: नाजुक हैं पहाड़, बड़े निर्माण में भूगर्भीय जांच जरूरी...पढ़ें डॉ रवि चोपड़ा का ये खास साक्षात्कार

Tue, 19 Dec 2023 01:55 PM IST
रेनू सकलानी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Tue, 19 Dec 2023 01:55 PM IST
सार

राज्य में बड़ी परियोजनाओं और निर्माण करने से पहले इस क्षेत्र की भूगर्भीय जांच अनिवार्य होनी चाहिए। पर्यावरणविद् डॉ. चोपड़ा से सिलक्यारा हादसे के बहाने पर्यावरणीय सरोकारों को लेकर विस्तृत बातचीत की गई। यहां पढ़ें पूरा साक्षात्कार...

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Environmentalist Dr. Ravi Chopra Talk About Silkyara accident and environmental concerns in Uttarakhand
पर्यावरणविद डॉ. रवि चोपड़ा - फोटो : amar ujala

विस्तार

सीमांत जिले उत्तरकाशी के सिलक्यारा में निर्माणाधीन सुरंग का एक हिस्सा ढहने से फंसे 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने के सफल अभियान की देश और दुनिया में खूब चर्चा रही, लेकिन इस हादसे के बाद पर्यावरणीय सरोकार, सुरक्षा कायदों और आपदा प्रबंधन को लेकर तमाम तरह के सवाल भी उठे हैं।

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चारधाम सड़क परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की हाईपावर कमेटी के अध्यक्ष रहे डॉ. रवि चोपड़ा के नजरिये से सिलक्यारा हादसा कोई अनोखी घटना नहीं है। उनका मानना है कि उत्तराखंड के पहाड़ बहुत नाजुक हैं और असावधानी की स्थिति में ऐसे हादसों की संभावना हमेशा बनी रहेगी।
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डॉ. चोपड़ा जोर देते हैं कि राज्य में बड़ी परियोजनाओं और निर्माण करने से पहले इस क्षेत्र की भूगर्भीय जांच अनिवार्य होनी चाहिए। अमर उजाला के स्टेट ब्यूरो चीफ राकेश खंडूड़ी ने डॉ. चोपड़ा से सिलक्यारा हादसे के बहाने पर्यावरणीय सरोकारों को लेकर विस्तृत बातचीत की। पेश है बातचीत के कुछ प्रमुख अंशः-

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प्रश्नः सिलक्यारा हादसे को आप कैसे देखते हैं?

जिस तरह से चारधाम सड़क परियोजना पर काम हुए हैं। हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट देखेंगे तो पाएंगे कि कमेटी ने यह पाया यहां बहुत तेजी से काम हो रहा है। जिस तरह की भूगर्भीय जांच यहां होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई। लिहाजा कई तरह के हादसे होने की यहां संभावना बनीं। सिलक्यारा टनल हादसा इसका उदाहरण है।

प्रश्नः लेकिन भूगर्भीय जांच तो हुई होगी?

मुझे नहीं पता कि इस बारे में लोगों ने कितनी जांच की। कितना अध्ययन किया, कितने सुरक्षा के उपाय किए, लेकिन देखने में आया है कि ये पर्याप्त नहीं था। इस पूरी परियोजना को तेजी से पूरा करने की कोशिश हुई, जिससे जिस तरह की जांच की जरूरत थी, वह नहीं हुई। इन्वायरमेंट इंपेक्ट असेसमेंट नहीं की गई। ईआईए होता तो एक डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान बनना पड़ता। प्लान बना होता तो सुरंग में एक्जिट टनल तो होती, ताकि हादसे के समय लोग सुरक्षित बाहर निकल जाएं। मैं तो यही कहूंगा कि इन क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर (अवस्थापना) का जो भी कार्य करना है, उसमें पूर्ण रूप से भूगर्भीय जांच करना अनिवार्य होना चाहिए।

प्रश्नः उत्तराखंड का यह इलाका भूगर्भीय दृष्टि से कितना संवेदनशील है?

हिमालय के पहाड़ अति संवेदनशील हैं। दूर से देखने में पत्थर बहुत बड़ा और ठोस नजर आता है। अपने आप में कोई एक चट्टान बहुत मजबूत हो सकती है, मगर उसमें दरार आ जाए तो वह चट्टान कमजोर हो जाती है। उत्तराखंड में चार मुख्य भ्रंश हैं। हिमालय फ्रंटल फाल्ट, फिर मसूरी के पास मैन बाउंड्री फाल्ट, सेंट्रल थ्रस्ट और फिर इंडो तिब्बत सूचक जोन। ये जो भ्रंश कोई एक रेखा नहीं है, वह एक जोन है। ये कुछ किमी में फैले है। पूरे राज्य में यह नेपाल की बाउंड्री से लेकर हिमाचल के बीच से गुजरते हैं। इनका जो इलाका है, उसमें धरती के अंदर की चट्टानें कभी न कभी आपस में फिसली हैं। जब फिसलन होती हैं तो घर्षण भी होता है। इस रगड़ से कमजोर पत्थर चकनाचूर हो जाता है। यह भ्रंश कई इलाकों में है, जहां से ये सड़कें गुजरती हैं। ये अत्यंत संवेदनशील हैं। वहां कोई काम करने से पहले गहरी जांचे होनी चाहिए कि पहाड़ की बनावट कैसी है।


 

प्रश्नः विकासकर्ताओं का मानना है कि पर्यावरण की दृष्टि से पहाड़ में सड़क बनाने से बेहतर विकल्प सुरंगों का निर्माण है?

यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि सुरंग का निर्माण किस पहाड़ में किस ढंग से हो रहा है। इसी सिलक्यारा टनल को हम लें तो इसके पीछे सरकार का उद्देश्य था कि राडी टॉप को पार कर दूसरी तरफ निकलने में लंबी दूरी तय करनी होती है। सुरंग बनने से मार्ग छोटा हो जाएगा, लेकिन यह भी देखना चाहिए कि यह पहाड़ कैसा है? यह पहाड़ मेन सेंट्रल थ्रस्ट के पड़ोस में है।

प्रश्नः यानी यह इलाका भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील है?

यह भी एक कमजोर जोन माना जाएगा। इस क्षेत्र से परिचित वैज्ञानिकों ने मुझे बताया कि वहां लाइम स्टोन भी था। अब लाइम स्टोन के ऊपर मिट्टी की परत और मिट्टी की परत के ऊपर जंगल है। यह जंगल बुरांस और बांज का है। वर्षा का पानी धीरे-धीरे रिसकर मिट्टी से पहाड़ के अंदर जाएगा। इससे चूना पत्थर पानी घुल जाएगा। जब वह घुलेगा तो उसमें एक छेद सा बन जाएगा। यानी वह इलाका ही कुदरती तौर पर एक बेहद संवेदनशील इलाका है।

प्रश्नः चारधाम परियोजना को लेकर आपने क्या बिंदु उठाए थे?

सर्वोच्च न्यायालय की हाईपावर कमेटी के अध्यक्ष पद से मैंने इस्तीफा दे दिया था, लेकिन जब हमने अध्ययन किया था, तब हमने मुख्य रूप से यह बात उठाई थी कि परियोजना से पर्यावरण का कितना नुकसान हुआ है। पहाड़ और कितने संवेदनशील हो गए हैं। लोगों के जनजीवन व जानवरों के जीवन पर क्या असर पड़ा है?

 

प्रश्नः बड़ी परियोजनाओं से परहेज करने की आपकी नसीहत विकास कर्ताओं नहीं सुहाती है? वे इसे विकास विरोधी करार देते हैं?

हर इलाके में एक ही प्रकार का विकास तो नहीं हो सकता है। वहां की पारिस्थितिकी को देखकर ही विकास होना चाहिए। क्या रेगिस्तान में 20-50 लाख लोगों का शहर बसाया जा सकता है। उसी तरह पहाड़ में यहां की पारिस्थितिकी को देखते हुए विकास होना चाहिए।

प्रश्नः उत्तराखंड संवेदनशील राज्य है तो विकास का मॉडल क्या होना चाहिए?

सरकारी रिपोर्ट हैं जो ग्रीन इकोनॉमी की बात करती हैं, लेकिन वह रिपोर्ट आती है और किसी दफ्तर में शेल्फ में रखी जाती है और कोई उस ओर ध्यान नहीं देता। हमारे पहाड़ में अधिकांश लोग खेती करते हैं। उन्हें जिस तरह की सरकारी सहायता मिलनी चाहिए, वह कभी नहीं दी गई। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान ने सतत विकास की रिपोर्ट तैयार की है, जो बताती है कि पहाड़ में सड़क बनाने का तरीका क्या हो और कैसे सुरक्षित और सतत सड़क बन सकती है।

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प्रश्नः उत्तराखंड में कृषि आधारित विकास संभव था और है

डॉ. चोपड़ा कहते हैं कि उत्तराखंड में खेती का एकीकृत सिस्टम था। जंगल, धारे, गाड-गदेरे और मवेशी जरूरी थे। अच्छी खेती होती थी, लेकिन उनकी फसलों के लिए बाजार उपलब्ध नहीं हो पाए। हमारे पड़ोस में हिमाचल उदाहरण है। कुल्लू और शिमला चले जाइए। वहां का रहन-सहन देखिए। उत्तराखंड में कृषि आधारित विकास संभव था और अभी भी है।

पहाड़ में सड़कें ज्यादा चौड़ी नहीं होनी चाहिए

डॉ चोपड़ा के मुताबिक, लेकिन जब मैं हाईपावर कमेटी में था, तब कमेटी ने फील्ड विजिट किया। कमेटी के कुछ सदस्यों का मत था कि सड़क 10 मीटर चौड़ी नहीं होनी चाहिए। जब हम भी फील्ड विजिट कर रहे थे, यह देख रहे थे कि कितना नुकसान हुआ है। सभी सदस्यों की एक ही रिपोर्ट थी कि यहां बर्बादी हो रही है। हमें सड़क मंत्रालय की मार्च 2018 की अधिसूचना मिली। अधिसूचना में कहा गया कि पहाड़ में नेशनल हाईवे की चौड़ाई साढ़े पांच मीटर होनी चाहिए। हमने यही कहा कि इस कानून पर टिकिए, लेकिन ये बातें खुलकर समाज में नहीं आती हैं।

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