{"_id":"0e6bc0d3965bef151cd062344b556656","slug":"entry-for-uttarakhand-state-song-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अपनी पसंद के राज्य गीत पर जल्द भेंजे एंट्री","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अपनी पसंद के राज्य गीत पर जल्द भेंजे एंट्री
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Wed, 04 Mar 2015 01:26 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तराखंड का राज्य गीत तैयार करने के लिए पूरे देश से एंट्री मांगी गई हैं। राज्य गीत चयन समिति के मुताबिक देश भर से मिलने वाली अर्जियों पर विचार कर राज्य गीत तैयार किया जाएगा।
विज्ञापन
एंट्रियों में जरूरत के अनुसार बदलाव किए जा सकेंगे। गीत का विमोचन इसी वर्ष राज्य गठन की वर्षगांठ पर किया जाएगा। सर्वश्रेष्ठ चुनी गई एंट्री को राज्य सरकार पुरस्कार भी देगी। संस्कृति विभाग की ओर से गठित राज्य गीत चयन समिति की पहली बैठक होते ही विरोध के स्वर उठने लगे हैं।
विज्ञापन
राज्य में किसी एक बोली पर सहमति नहीं बनने के बाद पहचान कायम रखने के लिए हिंदी में गीत तैयार करने पर मुहर लगी है। गीत में राज्य के खास मेले, पर्व, उत्सवों के नाम भी होंगे। सांस्कृतिक और लोक परंपराओं का समावेश होगा।
विज्ञापन
आंचलिक बोलियों की लाइनें भी डाली जाएंगी। संस्कृति विभाग निदेशक बीना भट्ट ने बताया कि 17 मार्च को समिति की बैठक होगी। इसमें सुझावों की एंट्री के लिए निकाले जा रहे विज्ञापन पर अंतिम मुहर लगेगी। विज्ञापन के मुताबिक देशभर के लोग सीधे संस्कृति विभाग में या विभाग की ईमेल आईडी पर एंट्री भेज सकते हैं। एंट्री की अंतिम तारीख 15 मई तय की गई है।
विरोधियों के लिए छोड़ दूंगा कुर्सी: नेगी दा
लोकगायक और राज्यगीत चयन समिति के सह अध्यक्ष नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि मैं जिंदगी भर गढ़वाली में गाने लिखता रहा हूं। ऐसे में हिंदी में गीत का चुनाव थोड़ा मुश्किल है। मगर यह राज्यहित में है।
गाना भले हिंदी में होगा, लेकिन उसमें आंचलिक बोली का समावेश होगा। अपने विरोधियों का स्वागत करता हूं। उनके लिए अपनी कुर्सी तक छोड़ सकता हूं। वह आएं और कमेटी का हिस्सा बनकर खुद गीत चुन लें।
हिंदी में राज्यगीत तैयार हो रहा है। यह स्वागत योग्य है। राज्यगीत ऐसा हो, जिसे हर जगह के लोग सुन सकें। जितना सुना जाएगा, गीत की उतनी ही महत्ता बढ़ेगी। आंचलिकता में गए तो पहाड़ पर कोस-कोस पर बोलियां बदलती हैं। ऐसे में कौन सी बोली में राज्य गीत बनाएंगे।
- सुभाष पंत, वरिष्ठ साहित्यकार, उत्तराखंड