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'यह दुकान ही मेरे परिवार की रोजी है'
राकेश शर्मा/अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 11 Apr 2014 11:44 AM IST
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‘साहब, मुझे छोड़ दो। गरीब आदमी हूं। यह दुकान ही मेरे परिवार की रोजी का जरिया है। दुकान मत तोड़ो। मैं इसे खुद ही हटा लूंगा।’
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हकीकत से रूबरू होना पड़ा
आंखों में आंसू लिए एक दुकानदार कुछ इस तरह अतिक्रमण ध्वस्त करने पहुंची टीम से गुहार लगा रहा था। लेकिन अफसरों ने एक नहीं सुनी तो उसने सच उगल दिया। रोते-चिल्लाते हुए कहा, ‘साहब, तब मुझे क्यों नहीं रोका जब मैंने दुकान यहां सजाई थी। मुझसे दुकान लगाने की वसूली भी की गई। फिर भी मेरे पेट पर लात मारी जा रही है।’
अतिक्रमण हटाने चकराता रोड पर निकली प्रशासन, लोनिवि, नगर निगम और पुलिस की संयुक्त टीम को कुछ इस तरह हकीकत से रूबरू होना पड़ा।
दुकानदार तो टूटी दुकान देखते और किस्मत को कोसते हुए रोते-रोते निकल गया, लेकिन पीछे छोड़ गया कई सवाल। वह यह कि अब भले ही हाईकोर्ट के आदेश के बाद अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा रही है, लेकिन जिम्मेदार विभाग तब क्यों आंखें बंद किए हुए थे, जब अतिक्रमण किया गया था।
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जिस तादाद में सड़क के फुटपाथों पर निर्माण हुए हैं, यह रातोंरात संभव नहीं। यह साफ इशारा करता है कि कहीं न कहीं अवैध कब्जों को विभागीय अफसरों की भी शह हासिल थी।
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जिम्मेदारी तो इनकी भी
शहर में फुटपाथों पर अतिक्रमण के लिए जितने सरकारी विभागों के कर्मचारी जिम्मेदार हैं, उतने ही वे व्यापारी भी जो नियमों की धज्जियां उड़ाकर जनता के लिए बने फुटपाथों पर कब्जे करने से गुरेज नहीं करते।
वे व्यापारी भी अतिक्रमण के दोषी हैं, जो चंद रुपयों के लालच में फुटपाथ फड़वालों को किराये पर देते हैं। पलटन बाजार में फुटपाथों पर सजी दुकानें यह हकीकत बयां करती हैं।
खास बात यह है कि प्रशासन और पुलिस बाजार में कई बार अतिक्रमण हटवा चुके हैं, लेकिन व्यापारी हर बार कुछ दिन चुप रहने के बाद फिर दुकानों का सामान फुटपाथों पर सजा लेते हैं।
इससे बाजार आने वाले लोगों के लिए चलने तक की जगह नहीं बच पाती। यही नहीं, कई बार अभियान चलाने के दौरान नियम तोड़ने के बावजूद विरोध जताकर खुद को सही साबित करने की भी कोशिश की जाती है।