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उत्तराखंडः 108 इमरजेंसी सेवा बनी 'मौत की इमरजेंसी'

Mon, 02 Nov 2015 01:40 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, साहिया
ब्यूरो / अमर उजाला, साहिया Updated Mon, 02 Nov 2015 01:40 PM IST
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emergency service 108 become death emergency.

उत्तराखंड में आपातकालीन 108 एंबुलेंस सेवा को दुरुस्त करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन 108 इमरजेंसी सेवा मरीजों के लिए 'मौत की इमरजेंसी' बन गई है।

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शनिवार रात सामने आई घटना से तमाम दावों की कलई खुल गई। उत्तराखंड में विकासनगर के अंतर्गत सीएचसी साहिया से संबद्ध 108 सेवा दो दिन से बंद है। इस वजह से देर रात जच्चा-बच्चा की जान पर बन आई। एंबुलेंस नहीं आने के कारण महिला ने बीच रास्ते में बच्चे को जन्म दिया। जच्चा-बच्चा स्वस्थ हैं। उन्हें सीएचसी साहिया में भर्ती कराया गया है।
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सुपऊ निवासी दीवान सिंह की पत्नी रविता (35) शनिवार देर रात प्रसव पीड़ा हुई। परिजनों ने 108 एंबुलेंस सेवा से संपर्क साधा तो कंट्रोल रूम ने सीएचसी साहिया की एंबुलेंस खराब होने की बात कही गई। बताया गया कि 48 किमी दूर सीएचसी चकराता से एंबुलेंस भेजी जा रही है। जबकि सुपऊ से साहिया की दूरी महज 24 किमी है।
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जब तक चकराता से एंबुलेंस सुपऊ तक पहुंचती महिला की प्रसव पीड़ा बढ़ चुकी थी। परिजन किसी तरह प्राइवेट वाहन से महिला को लेकर पजिटिलानी तक पहुंचे। यहां से महिला को एंबुलेंस सेवा उपलब्ध हो सकी। अस्पताल ले जाते वक्त महिला ने रास्ते में एंबुलेंस में ही बच्चे को जन्म दिया।

...तो कंडम टायरों पर दौड़ रही थी एंबुलेंस
सीएचसी साहिया में 108 एंबुलेंस सेवा के पहियों के थमने का कारण एंबुलेंस के टायरों का कंडम हालत में होना बताया जा रहा है। टायर इस कदर घिस चुके हैं कि उनके भरोसे पथरीले दुर्गम पहाड़ी मार्गों पर सफर मुमकिन नहीं है। लिहाजा कर्मचारियों ने दो दिन पूर्व एंबुलेंस को अस्पताल में खड़ा कर दिया।

कर्मचारियों का कहना है कि करीब डेढ़ माह पहले ही टायरों की मांग की जा चुकी है, लेकिन अब तक टायर उपलब्ध नहीं हुए हैं। घिसे टायरों के भरोसे मरीजों की जान को सांसत में नहीं डाला जा सकता। 108 एंबुलेंस सेवा एक माह में 1000 किमी से भी अधिक का सफर तय करती है।

पहले जा चुकी है जान
पहाड़ी इलाकों में एंबुलेंस सेवा किस हद तक जरूरी है कि इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ दिन पूर्व कुछ इसी तरह के हालातों में समय पर इलाज ना मिलने से मलेथा के ग्राम प्रधान की पत्नी ने बीच रास्ते में दम तोड़ दिया था। तब 108 एंबुलेंस सेवा को बेहतर करने के दावे किए गए थे। लेकिन इस मामले के बाद एक बार फिर इन दावों की हवा निकल गई है।

एक माह में आते हैं 50 से अधिक केस

emergency service 108 become death emergency.

सीएचसी साहिया 100 से अधिक गांवों का केंद्र बिंदु हैं। ऐसे में औसतन हर माह यहां एंबुलेंस सेवा से 50 मरीज पहुंचते हैं। इसमें अधिकांश गंभीर होते हैं।

पायलेट भी कम
मानक के अनुसार एंबुलेंस सेवा में तीन पायलेट और तीन फार्मासिस्ट का प्रावधान है। लेकिन इसके उलट सीएचसी साहिया में महज दो पायलट और दो फार्मासिस्ट ही मौजूद हैं। कई बार एक पायलट और फार्मासिस्ट के छुट्टी पर जाने से दूसरे पायलट और फार्मासिस्ट को 24-24 घंटे की ड्यूटी भी करनी पड़ती है।

खुशियों की सवारी भी ठप
ग्रामीण अंचलों में जच्चा और बच्चा की सुविधा के लिए खुशियों की सवारी सेवा को शुरू किया गया है। लेकिन जौनसार बावर के ग्रामीण अंचलों में यह सेवा उपलब्ध नहीं है। शुरुआत में त्यूनी और साहिया में एक-एक खुशियों की सवारी को रखा गया था। लेकिन बाद में दोनों ही सेवाओं का संचालन बजट का अभाव बताकर बंद कर दिया गया।

बजट की कमी के चलते एंबुलेंस के टायरों को नहीं बदला जा सका। अब बजट उपलब्ध हो गया है। एक से दो दिन में टायरों को बदल दिया जाएगा।
- मनीष टिकू, स्टेट हेड 108 एंबुलेंस सेवा

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