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उत्तराखंड: सरस्वती ताल 700 मी. लंबा और 30 मीटर गहरा मिला, हिमनद झीलों में अर्ली वर्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी

Sat, 26 Sep 2026 02:24 PM IST
Renu Saklani अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: Renu Saklani Updated Sat, 26 Sep 2026 02:24 PM IST
सार

हिमनद झीलों की स्थिति और उनसे जुड़े खतरे को समझने के लिए किए गए अध्ययन में अहम जानकारी सामने आई है। सरस्वती ताल के साथ केदारताल का भी जायजा लिया गया, जहां ग्लेशियरों के पिघलने की स्थिति का भी अध्ययन किया गया।

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Early warning systems planned for glacier lakes saraswati Tal 700m Long 30m deep uttarakhand news
ग्लेशियर (सांकेतिक फोटो) - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमनद झील सरस्वती ताल की लंबाई 700 मीटर, चौड़ाई 300 मीटर और गहराई 30 मीटर मिली है। झील से पानी की निकासी हो रही है। यह निष्कर्ष हाल ही में सरस्वती और केदारताल झील का अध्ययन करने गई टीम ने निकाला है। उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण राज्य की हिमनद झीलों का अध्ययन करा रहा है।

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सूत्रों के अनुसार, टीम को झीलों का जल निकासी मार्ग भी मिला है। सरस्वती ताल की घाटी तुलनात्मक तौर पर अधिक चौड़ी है। अध्ययन में पता चला कि केदारताल का आकार सरस्वती ताल से करीब आधा है। केदारताल की घाटी सरस्वती ताल की तुलना में संकरी है।

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टीम ने इन झीलों के आसपास के आबादी क्षेत्र का भी अध्ययन किया है। इस अध्ययन में यूएलएमएमसी, एनआईएच, बीएसआईपी, वाडिया संस्थान और एसडीआरएफ शामिल रहे। यूएसडीएमए के सहयोग से अर्ली वर्निंग सिस्टम भी हिमनद झीलों पर लगाए जाने की तैयारी है।

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दोनों के पास के ग्लेशियर पिघल रहे

केदारताल और सरस्वती ताल दोनों मोरेन डैम हैं। मोरेन डैम प्राकृतिक बांध होते हैं जो ग्लेशियरों के पीछे हटने से मलबे से बनते हैं। केदारताल के पास केदारबमक ग्लेशियर पिघल रहा है। सरस्वती ताल के पास के ग्लेशियर की भी यही स्थिति है। टीम ने दोनों जगहों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम और आलवेदर स्टेशन लगाने के लिए स्थल भी देखे हैं।



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पहले टीम ने रेकी की

इन झीलों तक पहुंचना बेहद कठिन रहा है। सरस्वती ताल की ट्रैकिंग के लिए कोई निश्चित मार्ग नहीं था। इसलिए एक दिन पहले एक टीम ने मार्ग का अनुमान लगाया। इसके बाद अगले दिन पूरी टीम वहां पहुंची। आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि टीम ने अभी कोई रिपोर्ट नहीं दी है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही झीलों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

 

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