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क्यों खफा है हनुमान जी से द्रोणगिरि के लोग, पढ़िए ये दिलचस्प कहानी.. 

Mon, 14 Mar 2016 05:57 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून 
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून  Updated Mon, 14 Mar 2016 05:57 PM IST
सार

उत्तराखंड के हर क्षेत्र की प्रत्येक कथा है दिलचस्प।
पौराणिक कथाएं और किवदंतियां संकलित करवा रही राज्य सरकार।
इको टूरिज्म से भी जोड़े जाएंगे ऐसे क्षेत्र।
 

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Dronagiri people angry with lord Hanuman.
द्रोणगिरि और हनुमान जी - फोटो : file photo

विस्तार

चमोली जिले की मलारी घाटी स्थित द्रोणगिरि गांव के लोग भगवान हनुमान से बेहद खफा है। यहां के लोग गांव में उनका मंदिर तक बनाते। दरअसल संजीवनी बूटी के लिए पूरा पहाड़ उखाड़ ले जाने के कारण गांव के लोग भगवान हनुमान से आज भी खफा बताए जाते हैं। 

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हिमालयी क्षेत्र में ऐसी कई पौराणिक कथाएं और किवदंतियां हैं, जिन्हें अब राज्य सरकार संकलित करवा रही है। यमुना घाटी, टौंस घाटी, गंगा बेसिन और इससे जुड़ी सहयोगी नदियों की घाटियों का हर क्षेत्र अपने में एक पौराणिकता संजोये हुए है। 
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इन किवदंतियों को संकलित कर हिमालयी संस्कृति को सुरक्षित करने के साथ इसे विश्व पटल पर लाया जाएगा। इन क्षेत्रों को इको टूरिज्म से भी जोड़ा जाएगा। पहली बार प्रदेश सरकार ने अपने बजट में कि वदंतियों के संकलन का प्रावधान किया है।
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उत्तराखंड के हर क्षेत्र की प्रत्येक कथा दिलचस्प है:
उत्तराखंड के हर क्षेत्र की प्रत्येक कथा दिलचस्प है। सैकड़ों साल की ये किवदंतियां आज क्षेत्रीय बुजुर्गों के दिलों में महफूज हैं। इन्हें माना भी जा रहा है, जैसे उत्तरकाशी जिले की टौंस घाटी के फतेह पर्वत क्षेत्र के लोग दुर्योधन का मंदिर बनाकर उसकी पूजा करते हैं। यहां का राजा मानवता प्रेमी तो था लेकिन कौरवों की तरफ रहा।
 

द्वितीय विश्व युद्ध के भगोड़े सैनिक ने रोपी थी मशहूर हर्षिल के सेब की पौध

Dronagiri people angry with lord Hanuman.
द्रोणगिरि - फोटो : ‌file photo

गांवों में पौराणिकता का भरा हुआ खजाना
​यमुना घाटी के रवांई क्षेत्र में पांडवों की पूजा होती है। गंगोत्री क्षेत्र के मशहूर हर्षिल के सेब की पौध द्वितीय विश्व युद्ध के भगोड़े सैनिक ने रोपी थी। वह ब्रिटेन से पौध लाया था। उसे क्षेत्रीय लोग राजा कहने लगे।

क्षेत्र में आज भी राजा विलसन की आत्मा घूमने की तरह-तरह की कहानियां प्रचलित हैं। इन कहानियों को संकलित करने के लिए पहली बार राज्य के बजट में 27.85 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

प्रदेश की गंगा, यमुना और सहयोगी नदियों की घाटियों के गांवों में पौराणिकता का खजाना भरा हुआ है। पलायन के कारण इन गांवों को खाली होने से अगली पीढ़ी तक इन किस्सों के न पहुंच पाने का भी खतरा है।

मध्य हिमालयी क्षेत्र से महाकाव्य काल से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध की तमाम बेशकीमती कथाएं जुड़ी हैं। उत्तराखंड भाषा संस्थान के माध्यम से मध्य हिमालयी क्षेत्र का सर्वे कराकर इन कथाओं को इकट्ठा किया जा रहा है।

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