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बीस साल से जंगल और गोदाम में धूल फांक रहीं करोड़ों की मशीनें
कुलदीप सिंह/अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 12 Nov 2016 02:59 AM IST
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गोदाम में रखी हैं ड्रिल मशीन
- फोटो : AmarUjala
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लापरवाही का आलम यह है कि खनिज संपदा की खोज में मददगार करीब दो करोड़ की ड्रिल मशीनें पिछले बीस साल से जंगलों और गोदामों में पड़ी है। इन मशीनों की देखरेख के लिए आठ कर्मी तैनात है, जिनके ऊपर वेतन के रूप में हर माह करीब दो लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
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गौर करने वाली बात यह है कि राज्य बनने के बाद से मशीनों के इस्तेमाल के लिए बजट के रूप में एक रुपये तक सरकार की ओर से जारी नहीं किए गए। जबकि उत्तर प्रदेश के समय इस क्षेत्र में खनिज संपदा के लिए 92 क्षेत्रचिह्नित किए गए थे। इस बारे में भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग के निदेशक विनय शंकर पांडेय का बयान और भी हैरान करने वाला है। उनका कहना है कि उन्हें जंगलों में पड़ी ड्रिल मशीनों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है।
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2 मशीनें कैराड और नायली (चकराता) के जंगलों में, 3 अस्कोट (पिथौरागढ़) में, 2 फ्ल्याल्टी (अल्मोड़ा), जबकि 2 ही मशीनें देहरादून के भोपाल पानी स्थिति भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग के गोदाम में पड़ी हैं। विभागीय अधिकारियों की माने तो इन मशीनों की लागत दो करोड़ से अधिक बताई जा रही है।
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दो करोड़ की मशीन और हुआ नहीं एक भी काम
ड्रिल मशीन
- फोटो : file photo
गौर करने वाली बात यह है कि दो करोड़ की मशीनों से धेले भर का भी काम नहीं लिया गया है। इस संबंध में भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग के संयुक्त निदेशक भूविज्ञान अनिल कुमार का कहना है कि मैन पावर पर्याप्त नहीं होने से मशीनों का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। इसके लिए शासन को कई बार लिखा गया है लेकिन, आज तक ध्यान नहीं दिया गया। मालूम हो कि मौजूदा समय में खनिज संपदा की खोज के लिए विभाग के पास तीन भू-वैज्ञानिक, तीन सहायक भू-वैज्ञानिक, तीन टेक्निक ल अस्सिटेंट और आठ ड्रिल कर्मचारी हैं।
भले ही स्टाफ की कमी है लेकिन, भूवैज्ञानिक कार्ययोजना बनाकर देंगे तो शासन आउटसोर्सिंग एजेंसियों से भी काम करवा सकता है। आज तक कार्ययोजना नहीं मिली है।
-एस.एल. पेट्रिक , अपर निदेशक ,भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग
यह होता है ड्रिल मशीन का काम
यह मशीन किसी खनिज संपदा (लाइम स्टोन, चूना पत्थर, बहुमूल्य धातु आदि) की खोज के काम आती है। इसकी मदद से 150 मीटर गहरा और इतनी ही सीधी पहाड़ में ड्रिल की जाती है। उसके माध्यम से अंदर से जो पत्थर, मिटृटी आती है उसकी जांच की जाती है। उससे पता लगाया जाता है यह पत्थर और मिट्टी किस काम आ सकती है या किस क्षेत्र में कौन सी खनिज संपदा, धातू मौजूद है।
प्रदेश में खनिज संपदा की कमी नहीं
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अधीक्षण भूवैज्ञानिक भूपेंद्र सिंह का कहना है कि उत्तराखंड में खनिज संपदा (लाइम स्टोन, चूना पत्थर, बहुमूल्य धातु आदि) के भंडार है। इस पर भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण भी काम कर रहा है।
भले ही स्टाफ की कमी है लेकिन, भूवैज्ञानिक कार्ययोजना बनाकर देंगे तो शासन आउटसोर्सिंग एजेंसियों से भी काम करवा सकता है। आज तक कार्ययोजना नहीं मिली है।
-एस.एल. पेट्रिक , अपर निदेशक ,भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग
यह होता है ड्रिल मशीन का काम
यह मशीन किसी खनिज संपदा (लाइम स्टोन, चूना पत्थर, बहुमूल्य धातु आदि) की खोज के काम आती है। इसकी मदद से 150 मीटर गहरा और इतनी ही सीधी पहाड़ में ड्रिल की जाती है। उसके माध्यम से अंदर से जो पत्थर, मिटृटी आती है उसकी जांच की जाती है। उससे पता लगाया जाता है यह पत्थर और मिट्टी किस काम आ सकती है या किस क्षेत्र में कौन सी खनिज संपदा, धातू मौजूद है।
प्रदेश में खनिज संपदा की कमी नहीं
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अधीक्षण भूवैज्ञानिक भूपेंद्र सिंह का कहना है कि उत्तराखंड में खनिज संपदा (लाइम स्टोन, चूना पत्थर, बहुमूल्य धातु आदि) के भंडार है। इस पर भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण भी काम कर रहा है।