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हादसों की हद से गुजरकर भी नहीं मानी हार

Tue, 03 Dec 2013 12:11 PM IST
नलिनी गुसाईं/ अमर उजाला, देहरादून
नलिनी गुसाईं/ अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 03 Dec 2013 12:11 PM IST
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disabled people got success

राजधानी देहरादून में रहने वाले ये वो लोग हैं जिन्होंने हादसों की हद से गुजर जाने के बाद भी हार नहीं मानी। विकलांगता के बावजूद इन्होंने समाज की बदलती सोच से दो-दो हाथ करने की ठानी और नए सिरे से जिंदगी से जूझने लगे।

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अब सिखाने का रखता हूं हुनर
कुम्हार मंडी में किराए के कमरे में रहने वाले 64 वर्षीय अशोक कुमार की आंखों की रोशनी नहीं रही। लाठी और बेटे का सहारा लेकर घर से बाहर निकल पाते हैं। बेटा जगह-जगह फेरी लगाकर गैस-चूल्हे आदि की मरम्मत करता है।
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बेटे का साथ दे रहे अशोक घर पर ही गैस-चूल्हा, सिलाई और वाशिंग मशीन की मरम्मत करते हैं। यही नहीं अशोक का कहना है कि मैं अब भी अपना ये हुनर दूसरों में बांट सकता हूं। कोई भी आए तो उसे यह काम सिखा सकता हूं।

उन्होंने बताया कि कई बार ऐसी जगहों से लोग उन्हें बुलाकर ले गए जहां आंख वाले भी उनका काम नहीं कर पाए। ऐसे में लोगों ने मुझे और भी काम दिलवाए।

कई बार सोचा, कर लूं आत्महत्या
भगत सिंह कॉलोनी निवासी जयलाल ने बताया कि मैं पहले किराए की टैक्सी चलाता था। एक दिन दुर्घटनाग्रस्त हो गया तो मालिकों ने भी कहा कि अब तू हमारे काम का नहीं रहा। मैं घर पर बैठ गया।

शरीर पूरी तरह से पैरालाइज था और मानसिक स्थिति भी बिगड़ गई थी। हाथ-पैर अब भी काम नहीं करते। अपने पराये हो गए थे। कई बार लगा कि आत्महत्या कर लूं। लेकिन बच्चों के लिए खुद को रोका। दो बेटे हैं और दो बेटियां।

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अपनी 9 और 5 साल की बेटियों की वजह से जी रहा हूं। उन्हें कहीं सेटल करना है। उन्हीं के लिए स्टीकर बेचने का काम कर रहा हूं।

रोज सुबह छतरी उल्टी कर इसमें भगवान के स्टीकर सजाता हूं और रेलवे स्टेशन, ईसी रोड जैसी जगहों पर बेचने के लिए निकल जाता हूं। पत्नी भी घर चलाने में मेरा सहयोग करती है।

ताना देने वाले अब मांगते हैं पैसा
क्लेमनटाउन निवासी इकबाल अहमद ने एक दुर्घटना में अपनी टांग क्या खोई मोहल्ले वालों ने ताने देने शुरू कर दिए। लोग कहते हैं कि अब इसके बस का कुछ नहीं रहा, इससे तो पान की दुकान लगवाओ।

इकबाल को यह बात इतनी खली कि वह कड़ी मेहनत कर आगे बढ़े। आज इकबाल के पास खुद के दो ट्रक और एक ट्रैक्टर है। उन्होंने अपने साथ दस और लोगों को रोजगार दिया है।

इकबाल ने बताया कि जब भी किसी विकलांग को देखता हूं तो मदद किए बिना नहीं रहा जाता। इकबाल ऐसा कोई धर्म नहीं जिसे ना मानते हों।

मोहल्ले के मंदिरों में जब भी किसी आयोजन के लिए पर्ची कटती है तो ऐसा नहीं होता उसमें इकबाल का नाम शामिल ना हो। इकबाल करीब पंद्रह साल पहले दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे।

6 महीने तक अस्पताल में भर्ती रहे और डॉक्टरों ने जवाब भी दे दिया था। अपनी आंख और पैर खोने वाले इकबाल अब रॉड के सहारे चलते हैं।

अफसर को योजनाओं की नहीं खबर
समाज कल्याण विभाग के हाल भी गजब हैं। जब यहां विकलांगों की संख्या के बारे में पूछा गया तो अधिकारी सिर्फ इतना बता पाए कि जिले में 8708 विकलांग हैं।

सभी को पेंशन दी जा रही है। अधिकारियों का तो यहां तक कहना था कि विभाग से और कोई योजना नहीं चलाई जा रही है।

जबकि विभाग की ओर से छापे गए पंपलेट में विकलांगों के लिए कई योजनाएं भी दी गई हैं। इस संबंध में जब जिला समाज कल्याण अधिकारी राम अवतार सिंह से पूछा गया तो उन्होंने पहले तो सीधे मना कर दिया कि विभाग में पेंशन के अलावा कोई और योजना संचालित नहीं है।

योजनाओं के बारे में विकलांग जनायुक्त से जानकारी हासिल करें। बाद में उन्होंने संबंधित जानकारी छुट्टी पर गए एक बाबू के कंप्यूटर में होने के साथ ही इस बारे में कुछ भी बतने की असमर्थता जता दी।


कार्यालय शिफ्ट होने की सूचना तक नहीं दी
सोमवार को कुछ विकलांग पेंशन के संबंध में बात करने ईसी रोड स्थित समाज कल्याण विभाग पहुंचे तो उन्हें यहां से यही जवाब मिला कि कंप्यूटर वाले बाबू छुट्टी पर हैं। इस पर एक बुजुर्ग ने कहा कि विभाग ने कार्यालय शिफ्ट होने की सूचना तक नहीं दी।

पहले हम भगत सिंह कॉलोनी गए लेकिन पता लगा कि कार्यालय शिफ्ट हो गया है। फिर किसी ने बताया कि कार्यालय अजबपुर में है तो हम बामुश्किल यहां पहुंचे। अब यहां पहुंचने पर कहा जा रहा है कि बाबू नहीं है।

काला दिवस की रूप में मनाया
नंदा देवी निर्धन विकलांग कल्याण एसोसिएशन के उपाध्यक्ष शफीकुररहमान का कहना है कि विकलांगों की अनदेखी की जा रही है। समाज कल्याण की किसी योजना का फायदा उन्हें नहीं मिल पा रहा है। पेंशन भी मात्र 600 रुपए दी जा रही है।

यही वजह है कि विश्व विकलांग दिवस को एसोसिएशन की ओर से काला दिवस की रूप में मनाया जा रहा है। इसके तहत मंगलवार को गांधी पार्क में धरना दिया जाएगा।

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