{"_id":"59e5aeae4f1c1bf2538b7a01","slug":"different-tradition-on-diwali","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"भारत में यहां नहीं मनाई जाती दीपावली, लेकिन मनाते हैं ये अनोखा रिवाज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भारत में यहां नहीं मनाई जाती दीपावली, लेकिन मनाते हैं ये अनोखा रिवाज
प्रवीन कोहली / अमर उजाला, खटीमा
Updated Tue, 17 Oct 2017 12:49 PM IST
विज्ञापन
tharu
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
थारु जनजाति अपने रीति रिवाज और अनूठी परंपराओं के लिए जानी जाती है। दीपावली में एक ओर जहां गैर जनजातियों में लक्ष्मी पूजा, दीपोत्सव, आतिशबाजी का चलन है, वहीं जनजाति समाज में दीपावली की जगह दीवारी मनाने का रिवाज है।
विज्ञापन
इस दिन जनजाति के लोग अपने मृत परिजन की याद में उसका पुतला बनाकर पूजा अर्चना के जरिये श्रद्धांजलि देते हैं। इस दिन थरुवाट में बड़ी रोटी अर्थात खाने का कार्यक्रम होता है जिसमें निकट संबंधियों सहित परिवार के लोग शामिल होते हैं।
विज्ञापन
हालांकि, इस जनजाति क्षेत्र में गैर जनजाति के लोगों के आने के साथ ही अब रीति रिवाज में परिवर्तन आने लगा है। थारु समाज अब अन्य वर्गों की तरह ही मरने पर तेरहवीं करने और दीपावली के दिन इसे मनाने भी लगा है।
विज्ञापन
थरुवाट में कायम है दीवारी की प्रथा
शवदाह के अगले शनिवार को रोटी दी जाती थी
थारु समाज के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक गोपाल सिंह राणा बताते हैं कि थरुवाट में अब धीरे-धीरे रीति रिवाज में बदलाव आ रहा है। बावजूद इसके दीवारी की प्रथा थरुवाट में कायम है। उन्होंने बताया कि जब थरुवाट में किसी की मृत्यु होती थी तो उसका शव चारपाई पर श्मशान तक ले जाया जाता था। मृतक को कंधा देने वालों को शवदाह के अगले शनिवार को रोटी दी जाती थी। उनका खाना आदि किया जाता था।
उसके बाद अमावस्या (दीपावली के दिन) बड़ी रोटी की जाती थी। उसमें सब रिश्तेदार, परिवार के लोग आते थे। वे सिर मुंडाकर मृतक का पुतला बना उसके नाम का दीपक जलाकर शोक व्यक्त करते थे। यह परंपरा राजस्थान की परंपरा है। यह पुष्कर में आज भी कायम है। सुबह के समय भोज होता है उसमें मीट, मुर्गा, मछली, दाल, चावल, गुलगुला, कतली सहित सभी थरुवाटी व्यंजन बनाकर पहले मृतक आत्मा को भोग दिया जाता है।
यह परंपरा अभी भी चलती है। दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा, दीपोत्सव, पटाखे जलाना कुछ नहीं होता था। अब इस परंपरा में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। अब थारु जनजाति के लोग भी तेरहवीं करने लगे हैं। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी भी देखा देखी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन कर रही है और पटाखे भी छुड़ा रही है।
उसके बाद अमावस्या (दीपावली के दिन) बड़ी रोटी की जाती थी। उसमें सब रिश्तेदार, परिवार के लोग आते थे। वे सिर मुंडाकर मृतक का पुतला बना उसके नाम का दीपक जलाकर शोक व्यक्त करते थे। यह परंपरा राजस्थान की परंपरा है। यह पुष्कर में आज भी कायम है। सुबह के समय भोज होता है उसमें मीट, मुर्गा, मछली, दाल, चावल, गुलगुला, कतली सहित सभी थरुवाटी व्यंजन बनाकर पहले मृतक आत्मा को भोग दिया जाता है।
यह परंपरा अभी भी चलती है। दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा, दीपोत्सव, पटाखे जलाना कुछ नहीं होता था। अब इस परंपरा में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। अब थारु जनजाति के लोग भी तेरहवीं करने लगे हैं। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी भी देखा देखी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन कर रही है और पटाखे भी छुड़ा रही है।