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तो राजभवन में हो जाता अवैधानिक 'काम'

Thu, 17 Oct 2013 08:21 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 17 Oct 2013 08:21 AM IST
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Deputy Lokayukta oath ceremony suddenly stopped

देहरादून स्थित राजभवन में होने जा रहा एक अवैधानिक कार्य ऐन वक्त पर टल गया। विवादों से घिरे उप लोकायुक्त के शपथग्रहण को अचानक रोक दिया गया।

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नियुक्ति आदेश जारी होने के बाद बुधवार को इस पद पर लोक सेवा आयोग के सदस्य पद से इस्तीफा देकर आए डी के भट्ट को शपथ दिलाई जानी थी।

जल्दबाजी में यह सब इस खुलासे के बाद किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक को मंजूरी दी जा चुकी है और नए एक्ट में उप लोकायुक्त का पद ही नहीं है।
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किसी सरकारी पद पर नियुक्त नहीं हो सकता
डीके भट्ट की नियुक्ति इस आधार पर भी गलत बताई जा रही थी कि संविधान के अनुच्छेद 319 के मुताबिक लोक सेवा आयोग में अध्यक्ष व सदस्य के पद पर वही व्यक्ति पदासीन हो सकता है जो अन्यत्र कहीं नौकरी ना करता हो और आयोग में एक बार रहने के बाद कोई व्यक्ति सरकार द्वारा दिए जाने वाले किसी सरकारी पद पर नियुक्त नहीं हो सकता।
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इसके पीछे यही मंशा है कि अमुक व्यक्ति निष्पक्षता से काम करे। न्याय विभाग ने भी नियुक्ति का विरोध किया था लेकिन महाधिवक्ता यूके उनियाल ने नियुक्ति के हक में अपनी राय दी। 11 अक्टूबर को राजभवन की मंजूरी मिलने के बाद सतर्कता विभाग ने नियुक्ति आदेश जारी कर दिए थे।

गवर्नर को अंधेरे में रखा

लोकायुक्त विधेयक को मंजूरी मिलने और संवैधानिक प्रावधान की बाधा संबंधी तथ्यों से सरकारी तंत्र ने राजभवन को अंधेरे में रखकर उप लोकायुक्त के पद पर नियुक्ति की फाइल मंजूर करा ली।

विधायी विभाग भी इसकी पुष्टि कर चुका है कि राष्ट्रपति ने पिछले दिनों विधेयक को मंजूरी दे दी। तत्काल बाद ही इस मामले में अधिकृत तौर पर राज्य सरकार को सूचना भी मिल गई। लेकिन इसके बावजूद नियुक्ति की फाइल चला दी गई।

इसलिए यदि समय रहते टाला नहीं होता तो आज का शपथग्रहण अवैधानिक कृत्य की श्रेणी में आता।

मुख्यमंत्री भी लोकायुक्त के दायरे में
खंडूड़ी सरकार में पारित लोकायुक्त विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलते ही इसके दायरे में मुख्यमंत्री से लेकर चतुर्थ श्रेणी कार्मिक तक आ गए हैं। एक-दो दिन में इसका नोटीफिकेशन जारी होते ही यह कानून के तौर पर प्रदेश में लागू हो जाएगा।


राष्ट्रपति को भेजा गया विधेयक का ड्राफ्ट अगर बिना संशोधन मंजूर हुआ तो लोकायुक्त के दायरे में अधीनस्थ न्यायपालिका भी आ जाएगी। सिर्फ हाईकोर्ट के जजों को इससे मुक्त रखा गया है। भुवनचंद्र खंडूड़ी ने दूसरी बार नेतृत्व संभालने के बाद अक्तूबर 2011 में मजबूत लोकायुक्त की घोषणा की थी।

उसके बाद पखवाड़ेभर की मशक्कत में लोकायुक्त का ड्राफ्ट तैयार कर कैबिनेट और विधानसभा से पास करवा कर राज्यपाल मार्ग्रेट अल्वा को भेजा गया।

वहां से ड्राफ्ट विधायी विभाग को फिर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने में करीब दो साल लग गए। सितंबर के अंत में यह विधेयक राष्ट्रपति भवन से आ गया था, इसके बावजूद इसका खुलासा नहीं किया गया।

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