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गैरसैंण विधानसभा सत्र में लोकतांत्रिक परंपराओं की रस्म अदायगी: यशपाल आर्य
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देहरादून। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा, गैरसैंण में मात्र दो दिन का सत्र कर सरकार लोकतांत्रिक परंपराओं की रस्म अदायगी कर रही है। यह हास्यास्पद है कि अंतिम सत्र गैरसैंण में है और कार्यमंत्रणा समिति और विधानमंडल दल के नेताओं की महत्वपूर्ण बैठकें देहरादून में हो रही हैं।
आर्य ने कहा, यह निर्णय संसदीय परंपराओं, गैरसैंण की गरिमा और सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने सरकार और विधानसभा सचिवालय से स्पष्टीकरण मांगा कि बैठकें गैरसैंण में क्यों नहीं हो रही हैं। इन बैठकों का आयोजन गैरसैंण में होना चाहिए था। इससे प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी की गरिमा और संसदीय मर्यादाओं का सम्मान सुनिश्चित होता। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल औपचारिकता निभा रही है। यह प्रदेश की जनता की आकांक्षाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ न्याय नहीं है। गैरसैंण पर्वतीय क्षेत्रों के विकास का प्रतीक है पर सरकार के निर्णय इस भावना पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
सरकार ने अंतिम सत्र को भी मात्र दो दिनों तक सीमित कर दिया है। इससे बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पाएगी। जनता के सवालों को सदन में उठाने के लोकतांत्रिक अवसर सीमित हो रहे हैं।
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उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस की परिवर्तन रैलियों को प्रभावित किया जा रहा है। वरिष्ठ कांग्रेस विधायकों को सत्र से तीन दिन पहले देहरादून बुलाना इसी का हिस्सा है। सरकार जनता के मुद्दों को उठाने वाले विपक्ष की आवाज को सीमित करना चाहती है। उन्होंने मांग की कि सरकार सत्र की अवधि बढ़ाए और सभी बैठकें गैरसैंण में आयोजित करे।
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आर्य ने कहा, यह निर्णय संसदीय परंपराओं, गैरसैंण की गरिमा और सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने सरकार और विधानसभा सचिवालय से स्पष्टीकरण मांगा कि बैठकें गैरसैंण में क्यों नहीं हो रही हैं। इन बैठकों का आयोजन गैरसैंण में होना चाहिए था। इससे प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी की गरिमा और संसदीय मर्यादाओं का सम्मान सुनिश्चित होता। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल औपचारिकता निभा रही है। यह प्रदेश की जनता की आकांक्षाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ न्याय नहीं है। गैरसैंण पर्वतीय क्षेत्रों के विकास का प्रतीक है पर सरकार के निर्णय इस भावना पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
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सरकार ने अंतिम सत्र को भी मात्र दो दिनों तक सीमित कर दिया है। इससे बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पाएगी। जनता के सवालों को सदन में उठाने के लोकतांत्रिक अवसर सीमित हो रहे हैं।
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उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस की परिवर्तन रैलियों को प्रभावित किया जा रहा है। वरिष्ठ कांग्रेस विधायकों को सत्र से तीन दिन पहले देहरादून बुलाना इसी का हिस्सा है। सरकार जनता के मुद्दों को उठाने वाले विपक्ष की आवाज को सीमित करना चाहती है। उन्होंने मांग की कि सरकार सत्र की अवधि बढ़ाए और सभी बैठकें गैरसैंण में आयोजित करे।