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चाय बागान में नहीं बन पाएगी स्मार्ट सिटी!
गौरव मिश्रा/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 06 Dec 2015 10:52 AM IST
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चाय बागान में स्मार्ट सिटी बनाने के लिए उत्तराखंड सरकार ने भले ही भू-उपयोग का तोड़ अधिग्रहण के रूप में निकाल लिया है, लेकिन एक कानून ऐसा भी है जो सरकार की आतुरता पर भारी पड़ सकता है।
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यही नहीं, सरकार पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का भी आरोप लग सकता है। दरअसल, दून घाटी के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के एक फरवरी 1989 के नोटिफिकेशन का संज्ञान प्रदेश सरकार ने नहीं लिया है। हैरत की बात यह है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन में गठित दून वैली सुप्रीम कोर्ट मॉनिटरिंग कमेटी (एसपीएमसी) से भी अब तक इस बाबत बात नहीं की है।
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इन दोनों वजहों से प्रदेश सरकार की चाय बागान में स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद पर पानी फिर सकता है। बता दें कि मसूरी और देहरादून में चूने के जरूरत से ज्यादा खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। केंद्र में तब इंदिरा गांधी की सरकार थी। स्व. इंदिरा गांधी ने मसूरी और देहरादून को हरित बनाने के लिए अभियान चलाया था।
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इसके बाद दून घाटी को पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील करार कर दिया गया था। यहां पर उद्योग संचालन, खनन समेत तमाम विकासात्मक कार्यों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सिर्फ उन्हीं कार्यों की अनुमति प्रदान करने की व्यवस्था की गई थी, जिनकी स्वीकृति केंद्र सरकार देगी।
बिना केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के चाय बागान तो दूर उसका एक पत्ता भी प्रदेश सरकार या उसकी कोई एजेंसी नहीं तोड़ सकती। उद्योग स्थापित करने, खनन, पर्यटन गतिविधियों और भू-उपयोग बदलाव करने से पहले केंद्रीय वन एवं पर्यावरणीय मंत्रालय से अनुमति लेना जरूरी होता है। ऐसा नहीं करना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना भी होगी।
चाय बागान में स्मार्ट सिटी बनाने के लिए राज्य सरकार और चीन के विश्वविद्यालय के बीच समझौता 11 दिसंबर को होना है। प्रदेश सरकार और हुडको में भी वार्ता चल रही है। आरकेडिया और हरबंसवाला चाय बागान कंपनी डीटीसी इंडिया लिमिटेड से समझौता लगभग हो चुका है। लेकिन सरकार ने चाय बागान में स्मार्ट सिटी बनाने के संबंध में अभी तक केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति नहीं ली है।
इस बाबत एसपीएमसी के कई सदस्यों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि चाय बागानों के पेड़, यहां की जैव विविधता, जीव जंतुओं के विनाश की बात सरकार ने कैसे सोच ली? इनका यह भी कहना है कि वे लोग जल्द ही सरकार को इस बारे में पत्र लिखेंगे। इनका कहना है कि भले ही हम रेगुलेटरी बॉडी नहीं हैं, लेकिन मॉनिटरिंग का जिम्मा हमारे ऊपर है।
यह देखना एससीएमसी का काम है कि सरकार जो भी करे, वह केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के नियमों के अनुकूल करे। वर्ष 1989 के नोटिफिकेशन की एक-एक बात का ध्यान रखा जाए। दूसरी तरफ, परियोजना के नोडल अधिकारी आर मीनाक्षी सुंदरम ने बताया कि अभी परियोजना पर काम शुरू नहीं हुआ है। कार्य आरंभ करने से पहले अनुमति ले ली जाएगी।