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संघर्ष की आग में तपकर कुंदन बने जांबाज

Sun, 11 Jun 2017 12:05 PM IST
अनिल चन्दोला / अमर उजाला, देहरादून
अनिल चन्दोला / अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 11 Jun 2017 12:05 PM IST
सार

सैनिक के रूप में भर्ती होने के बाद प्राप्त किया कमीशन
पौड़ी निवासी सुरजन सिंह और रविंद्र बने फौज में अफसर

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Dehradun IMA Passing Out Parade.
सुरजन को गले लगाकर चूमती दादी - फोटो : amar ujala

विस्तार

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती... पौड़ी के सुरजन सिंह और रविंद्र सिंह रावत ने इस पंक्ति को सच कर दिखाया है।

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बचपन से सेना में अफसर बनने की तमन्ना थी, लेकिन हालात अनुकूल नहीं थे। बतौर सैनिक सेना में शामिल हुए, पर हौसला
नहीं खोया।

हिम्मत और कई वर्षों की मेहनत का नतीजा सामने आया और दोनों अफसर सेना में बनने में कामयाब हुए।
शनिवार को पासिंग आउट परेड के बाद वर्दी पर स्टार सजे तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। 

तल्ला बदलपुर रांईसेरा पौड़ी गढ़वाल निवासी सुरजन सिंह के पिता बलवंत सिंह किसान हैं। फौजी ताऊ गबर सिंह को देखकर
सुरजन ने भी उनकी राह पर चलने का फैसला किया। वह अफसर बनना चाहते थे, लेकिन सफलता नहीं मिली।

लिहाजा राजकीय इंटर कॉलेज सिंधपुर से 12वीं करने के बाद 2004 में बतौर सैनिक फौज का हिस्सा बने। इसके बावजूद उन्होंने
हिम्मत नहीं हारी और लगातार अपना सपना पूरा करने के लिए मेहनत करते रहे। मां गोविंदी देवी भी लगातार उनका हौसला
बढ़ाती रही। 

आखिरकार वर्ष 2014 में सुरजन को सफलता मिली और उन्होंने कमीशन प्राप्त कर आर्मी कैडेट कॉलेज (एसीसी)
ज्वाइन की। शनिवार को पासआउट होने के बाद उनके चेहरे पर कामयाबी की खुशी साफ देखी जा सकती थी। 

कुछ ऐसी ही कहानी है इस जाबाज की

Dehradun IMA Passing Out Parade.
अपने बेटे रविंद्र को चूमते माता पिता - फोटो : amar ujala

ऐसी ही कहानी सीला पट्टी के उमल्दा गांव निवासी रविंद्र सिंह रावत की भी है। उनका परिवार त्रिलोकपुर, कलालघाटी
कोटद्वार में रहता है।

सेना से ऑनरेरी सूबेदार मेजर पद से रिटायर्ड पिता वीरेंद्र सिंह को देखकर वह भी फौज में जाने का
सपना देखते। 2011 में सैनिक के रूप में वह सेना में शामिल हुए। पिता की प्रेरणा और अपनी मेहनत के बूते लगातार संघर्ष
करते रहे और 2013 में कमीशन प्राप्त किया। 2016 की एसीसी ग्रेजुएशन सेरेमनी में उन्हें गोल्ड मेडल से नवाजा गया।

उन्होंने कहा कि सैनिक के रूप में उच्चाधिकारियों के आदेश का पालन करना होता है। लेकिन अधिकारी के रूप में आपको खुद
निर्णय लेना होता है। 

भारतीय सेना के अधिकारी के रूप में आपके ऊपर कई जिम्मेदारियां होती हैं। उन्होंने कहा कि 2011 में भारतीय सेना में शामिल होने के बाद उन्हें खुद पर गर्व होता है। लेकिन आज अफसर की वर्दी और स्टार ने उनके साथ मां अनीता रावत समेत पूरे परिवार का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। उनके दादा छवाण सिंह और दादी कुंती देवी ने उनकी सफलता का जो सपना देखा, वह वर्षों की मेहनत के बाद पूरा हुआ है।

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आठ साल की मेहनत के बाद प्राप्त किया कमीशन 

Dehradun IMA Passing Out Parade.
IMA Passing Out Parade. - फोटो : amar ujala

शनिवार को आईएमए से पासआउट होने वाले दीपक पांडे मूलत: सिलोर रानीखेत, अल्मोड़ा के निवासी हैं।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा केंद्रीय विद्यालय हल्द्वानी से हुई। पिता लक्ष्मी दत्त पांडे को देख वह भी सैनिक बनने का सपना
देखते थे।

2005 में वह जवान के रूप में वायु सेना में भर्ती हुए। मां दीपा लगातार उन्हें प्रोत्साहित करती थीं। पढ़ने-लिखने के
शौकीन दीपक ने इसी दौरान 2010 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए मैथ्स और उसके बाद सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी से
मास्टर्स इन मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म किया। 

करीब आठ साल की मेहनत के बाद 2013 में उन्होंने कमीशन प्राप्त
किया और एसीसी ज्वाइन की। शनिवार को पीओपी में अंतिम पग पार कर वह भी भारतीय सेना में अफसर बन गए। इससे
परिवार में खुशी का माहौल है। 

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