उत्तराखंड : वयस्कों को पहले लगता टीका तो नहीं बिगड़ते हालात, वरिष्ठ फिजीशियन कर रहे टीकाकरण नीति में बदलाव की पैरवी
डॉ. बिष्ट का तर्क है कि महामारी में बुजुर्गों और बच्चों को आइसोलेशन में रखकर व वयस्कों को टीका लगाकर उसकी दूसरी लहर के घातक परिणामों को रोका जा सकता था।
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मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के वरिष्ठ फिजीशियन एवं राजकीय जिला अस्पताल कोरोनेशन में कोविड के नोडल अधिकारी डॉ. एनएस बिष्ट ने पहले बुजुर्गों को टीका लगाए जाने की बजाय नौकरीपेशा और आवाजाही करने वाले वयस्कों की बड़ी आबादी को पहले टीका लगाने की पैरवी की है।
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डॉ. बिष्ट का तर्क है कि महामारी में बुजुर्गों और बच्चों को आइसोलेशन में रखकर व वयस्कों को टीका लगाकर उसकी दूसरी लहर के घातक परिणामों को रोका जा सकता था। इसे लेकर सोशल मीडिया पर उनका लगभग सात मिनट का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है। अमर उजाला ने इस संबंध में डॉ. बिष्ट से बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश...
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सवाल : महामारी के बारे में आपका एक वीडियो वायरल हुआ है इस बारे में आपका क्या कहना है?
जवाब : कोरोना एक संक्रामक बीमारी है और बाढ़ की तरह आई है। मैंने द्रव गति विज्ञान से कोरोना की दूसरी लहर को समझाने की कोशिश की है। साथ तीसरी लहर की भविष्यवाणी के साथ ही इससे निपटने के उपाय और सुझाव दिए हैं।
सवाल : तो दूसरी लहर का सबसे बड़ा कारण आप क्या मानते हैं?
जवाब : मेरा ध्यान लोगों के घूमने-फिरने से ज्यादा कोरोना वायरस की गतिविधि पर है। शायद दुनियाभर में कोरोना वायरस के दृष्टिकोण को लेकर थोड़ी उलझन है। हम लोगों को पूरी तरह से घरों में रोककर इस दूसरी लहर को नहीं रोक सकते थे। क्योंकि पहली लहर में धीमा पड़ा कोरोना वायरस म्यूटेशन की ओर बढ़ने लगा था। जो स्वाभाविक था। उसे युवाओं में बढ़ना ही था। क्योंकि बुजुर्गों को टीका लग चुका था। कुछ हद तक उनके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) भी आ गई थी।
सवाल : तो क्या बुजुर्गों से पहले युवाओं को टीका लगना चाहिए था?
जवाब : दरअसल कोरोना महामारी विश्वयुद्ध की तरह है। इसलिए कमजोर के हाथ में अस्त्र पकड़ाना विवादास्पद हो सकता है। संवेदनशील या प्रतिरक्षण रहित व्यक्तियों को पृथक करना ज्यादा उचित होता। टीकाकरण का अस्त्र देश की गतिमान आबादी को थमाया जाना चाहिए था। कोई भी लड़ाई सबल को और मजबूत कर ही लड़ी जा सकती है।
सवाल : यानी तो क्या आम संक्रमणों के टीकाकरण और महामारी के टीकाकरण की नीति अलग-अलग होनी चाहिए?
जवाब : राष्ट्रीय टीकाकरण के लक्ष्य व्यक्ति रक्षा और रोग उन्मूलन के सिद्धांत पर आधारित होते हैं। उस समय हम किसी रोग प्रवाह का सामना नहीं कर रहे होते हैं। इसलिए संवेदनशील व्यक्ति को ही टीका लगाया जाता है।
सवाल : तो फिर स्वास्थ्यकर्मियों के साथ नौकरीपेशा कामगारों को भी टीका लगना चाहिए था?
जवाब : इस महामारी ने हमें यही सीख दी है कि जो लड़ाई लड़ सकता है या कम संवेदनशील है, उसके हाथों में अस्त्र-शस्त्र दिए जाने चाहिए। एक बहुत बड़ी कार्यशील आबादी को ज्यादा दिनों तक घर के भीतर नहीं रखा जा सकता। बच्चों और बुजुर्गों को आइसोलेट कर युवाओं व नौकरीपेशा लोगों को कोरोना का टीका देकर मजबूत किया जाना चाहिए।
सवाल : आपने बताया कि दूसरी लहर का कारण पहली लहर में बुजुर्गों का संक्रमित होना और अधिक उम्र के लोगों का टीकाकारण था, इसका क्या वैज्ञानिक आधार है?
जवाब : पहली लहर छह महीने में शिखर पर आई और अगले छह महीने में ढल गई। ढलान के दौरान वायरस को म्यूटेशन के लिए समय मिल गया और वह जमा होता गया। म्यूटेशन को मोटे तौर पर रास्ता बदलने की तरह देख सकते हैं। जब बुजुर्गों की तरफ रास्ता मिलना बंद हो गया तो वायरस वयस्कों की तरफ बढ़ा। रोजगार और अन्य कार्यों के चलते वयस्कों की बड़ी आबादी गतिमान होती है। इसलिए वायरस को तेजी से फैलने में मदद मिलती गई। महामारी में बुजुर्गों का आइसोलेशन और वयस्कों का टीकाकरण होना चाहिए था। भले ही यह मानवीय न लगे, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसा किया जाना चाहिए था।
सवाल : तो फिर क्या तीसरी लहर भी आएगी?
जवाब : जब बुजुर्गों की इम्यूनिटी कम होने लग जाएगी तो तीसरी लहर का अंदेशा है। बच्चे तो अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं। जब वयस्कों का टीकाकरण पूरा हो चुका होगा तो तीसरी लहर बुजुर्गों और बच्चों की तरफ ही बढ़ेगी, ऐसी संभावना है। ऐसे में बुजुर्गों के लिए फिर बूस्टर और बच्चों के लिए टीका बनाना होगा।