उत्तराखंड में कोरोना: हरिद्वार में की गई सबसे ज्यादा सैंपल जांच, लेकिन संक्रमण दर सबसे कम
हरिद्वार में कुंभ के दौरान एक कंपनी की ओर से सैंपल जांच में फर्जीवाड़ा सामने आने पर संक्रमण दर पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
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हरिद्वार में बीते 10 सप्ताह में हरिद्वार जिले में पूरे प्रदेश से 38 प्रतिशत टेस्ट किए गए लेकिन संक्रमण राज्य से 60 प्रतिशत कम रही है। फर्जीवाड़े की जिलाधिकारियों हरिद्वार के माध्यम से जांच की जा रही है।
सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटी फाउंडेशन के अध्यक्ष अनूप नौटियाल का कहना है कि सरकार व स्वास्थ्य विभाग को संक्रमण दर के आधार पर जांच करनी चाहिए। चार अप्रैल से 12 जून तक यानी 10 सप्ताह में हरिद्वार जिले में 3- प्रतिशत ज्यादा टेस्ट किए गए।
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इसके बावजूद भी सैंपल जांच के आधार पर हरिद्वार की संक्रमण दर प्रदेश से 60 प्रतिशत कम रही। उन्होंने कहा कि सैंपल जांच में गड़बड़ी हुई तो इसका बड़े पैमाने पर असर पर पड़ सकता है। 10 सप्ताह में कुल 882382 सैंपलों की जांच की गई। जिसमें 35168 लोग संक्रमित मिले। इसके आधार पर हरिद्वार संक्रमण सबसे कम 3.99 प्रतिशत रही।
विभागीय प्रारंभिक जांच में पाया गया कि कुंभ मेले के दौरान एक कंपनी ने रैपिड एंटीजन सैंपल जांच में गड़बड़ी की थी। एक ही मोबाइल नंबर व सैंपल आईडी नंबर से कई लोगों को निगेटिव रिपोर्ट तैयार की गई है। उन्होंने कहा कि सरकार व स्वास्थ्य विभाग को संक्रमण दर के हिसाब से पूरे मामले की जांच करनी चाहिए। जिससे संक्रमण का सही डाटा सामने आ सके।
आयुष्मान कार्ड धारक मरीजों से वसूले 1.62 करोड़ लौटाए
आयुष्मान योजना के कार्ड धारकों से कोरोना के इलाज की एवज में वसूली गई नकद राशि अब निजी अस्पताल वापस लौटाने को तैयार हैं। सरकार की सख्ती से 29 निजी अस्पतालों ने 210 मरीजों को 1.62 करोड़ की राशि वापस की है। जबकि 70 मामलों में पैसा वापस लौटाने की कार्रवाई चल रही है।
सरकार ने आयुष्मान योजना के गोल्डन कार्ड धारकों को सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में कैशलेस इलाज की सुविधा दी है। इसके बावजूद भी निजी अस्पतालों ने कैशलेस इलाज न देकर मरीजों से नकद राशि ली है।
इस पर राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण और सरकार की ओर से सख्ती करने के बाद योजना में सूचीबद्ध 29 निजी अस्पतालों ने 210 मरीजों को 1.62 करोड़ की राशि लौटा दी है। जबकि 70 मामलों में अस्पतालों की कार्रवाई चल रही है। प्राधिकरण का कहना है जो अस्पताल कार्ड धारक मरीजों को वापस नहीं करेगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के अध्यक्ष डीके कोटिया का कहना है कि गोल्डन कार्ड धारक मरीजों से कोरोना के इलाज का पैसा वसूलने की शिकायत मिलने पर कार्रवाई की गई। मरीजों को कैशलेस इलाज देने के लिए 35 सूचीबद्ध निजी अस्पतालों के साथ ऑनलाइन बैठक की। जिसमें अस्पतालों से भरोसा दिया कि यदि किसी कारण से कार्ड धारक मरीजों से इलाज का पैसा लिया गया है तो उसे अस्पताल वापस करेगा।
अब नौनिहालों को टीके लगवाने में भी झिझक
रुड़की नगर के इस्लामनगर इलाके में लोगों ने कोरोना वैक्सीनेशन के साथ ही बच्चों को सालभर में लगने वाले जीवनरक्षक टीके भी लगवाने बंद कर दिए हैं। एक महीने में जहां पहले 100 से 110 तक टीके लग जाते थे, वहां इस इलाकों में इस बार करीब 30 लोगों ने ही बच्चों को टीके लगवाए हैं।
बच्चे को जन्म लेकर करीब एक साल पूरा होने तक कई जीवनरक्षक टीके लगते हैं। बच्चों को सामान्य तौर पर जन्म से एक साल तक बीसीजी, ओपीवी-0, हेपेटाइटिस बी, रोटा-वन, रोटा-टू, एफआईपीवी-वन, एफआईपीवी-टू, पेंटावेलेंट-वन, पेंटावेलेंट-थ्री, एमसीवी, विटामिन-ए, डीपीटी-बी, ओपीवी-बी, टीटी आदि टीके लगते हैं। इन टीकों को लगाने की जिम्मेेदारी आशाएं और एएनएम पर होती है। शहर के सपना टाकिज के पास इस्लामनगर इलाके में हर महीने 100 से 110 बच्चों को टीके लगते हैं।
बच्चों को टीका लगाने के लिए हर हफ्ते बुधवार और शनिवार का दिन तय किया गया है। क्षेत्र की एक महिला अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मई में इस्लामनगर इलाके में करीब 107 बच्चों को अलग-अलग टीके लगते थे, लेकिन इस महीने करीब 30 महिलाओं ने ही अपने बच्चों को टीका लगवाया। जब सेंटर से आशाओं और एएनएम ने बच्चों के परिजनों को फोन किया तो उन्होंने टीका लगवाने साफ इनकार कर दिया। टीका लगवाने से मना करने के पीछे उन्होंने बड़े अजीब कारण बताए।
कुछ महिलाओं ने बच्चों का टीकाकरण कोरोना वैक्सीन के टीके से जोड़ दिया। ऐसे में मामले की गंभीरता को देखते हुए इस इलाके में महिलाओं के साथ बैठक आयोजित की। शहरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परियोजना प्रबंधक रंजना भटनागर ने बताया कि महिलाओं के साथ बैठक कर उन्हें बच्चों के टीकाकरण के फायदों को बताया गया। इसके बाद टीकाकरण में तेजी आई। हालांकि अभी भी बहुत से लोग बच्चों को टीका लगवाने नहीं आ रहे हैं। ऐसे में उनके घर जाकर उन्हें प्रेरित किया जाएगा।