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 उत्तराखंडः कोरोना संक्रमण से निपटने में सामने है कई चुनौतियों का पहाड़, देहरादून और हल्द्वानी में ज्यादा चुनौती

Fri, 20 Mar 2020 09:44 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Fri, 20 Mar 2020 09:44 AM IST
सार

  • सोशल डिस्टेंसिंग तो ठीक, संक्रमण से निपटने में प्रदेश की स्वास्थ्य सुविधाओं, जोखिम को भी देखना होगा सरकार को
  • फ्लोटिंग जनसंख्या को स्क्रीन करने की है चुनौती, देहरादून और हल्द्वानी सबसे अधिक प्रभावित 

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Corona virus : uttarakhand will face many challenges in dealing with Corona
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए प्रदेश सरकार को सोशल डिस्टेंसिंग के लिए लोगों को मनाने के साथ ही अन्य कई चुनौतियों से पार पाने की कोशिश करनी होगी। कुछ मामलों में सरकार चेती भी है लेकिन कई मामलों में अभी सरकारी मशीनरी का गियर अप होना बाकी है। 

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मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में करीब 50 प्रतिशत मामले तो बुखार, सर्दी, खांसी, जुखाम, सांस की तकलीफ आदि के हैं। यह वर्ग संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील भी है। मुसीबत ये भी है कि मौसम में बदलाव के कारण कई सुरक्षित स्थान अब संवेदनशील होते जा रहे हैं। प्रदेश में चंपावत और टिहरी दो ऐसे जिले हैं जो सबसे अधिक संवेदनशील पाए गए हैं। प्रदेश सरकार ने भी घनसाली और ऋषिकेश को सबसे अधिक संवेदनशील माना है और यह दोनों ही क्षेत्र टिहरी जिले में हैं। 
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एक बड़ी चुनौती फ्लोटिंग जनसंख्या भी है। देहरादून और हल्द्वानी में आसपास के क्षेत्रों से पहुंचने वाले लोगों की खासी संख्या है। उत्तर प्रदेश, हिमाचल के साथ ही उत्तराखंड की सीमा नेपाल और चीन से भी जुड़ी हुई है। नेपाल सीमा पर निगरानी बढ़ाने के लिए प्रदेश सरकार केंद्र से अधिक फोर्स मांग ही चुकी है। 

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कोरोना से मुकाबले में आड़े आएंगी ये छह चुनौतियां 

बुखार, जुखाम के सबसे ज्यादा रोगी

मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में सामान्य रूप से 35 प्रतिशत बुखार के मामले सामने आते हैं। सर्दी और जुखाम के 11 प्रतिशत और सांस से संबंधित मामले करीब चार प्रतिशत मामले हैं। जाहिर है के यह वर्ग इंफ्लुएंजा वर्ग में है और कोरोना संक्रमण के हिसाब से अधिक संवेदनशील है। स्वाइन फ्लू के पहाड़ में भी मामले सामने आए हैं।  

बुनियादी ढांचे का अभाव

स्वास्थ्य में बुनियादी ढांचे का भी अभाव है। प्रदेश में डाक्टरों की कमी है। सबसे ज्यादा कमी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में हैं। प्रदेश सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए एसडीआरएफ मद से 50 करोड़ रुपये स्वास्थ्य विभाग को भी दिए हैं। जिस तरह से प्रत्येक दिन परिस्थितियां बदल रही हैं। उसमें इस फंड का इस्तेमाल बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कर पाना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। 

गरीबी और विषमता भी आएगी आड़े

प्रदेश में गरीबी भले ही करीब 11 प्रतिशत आंकी गई हो, लेकिन जिलों में भारी असमानता है। मसलन चंपावत में गरीबी दर 35.25 प्रतिशत पाई गई है। अल्मोड़ा में 31, चमोली में 27, ऊधमसिंह नगर में 19 और हरिद्वार में करीब 16 प्रतिशत है। जाहिर है कि ज्यादा गरीबी अनुपात वाले जिलों में संक्रमण को संभालना कठिन होगा। गरीबी के साथ ही इन जिलों में गरीब और अमीर के बीच की खाई भी अधिक है। मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में चमोली में यह विषमता सबसे अधिक है। 

जन स्वास्थ्य पर खर्च बेहद कम, लोगों का सरकार पर भरोसा कम

प्रदेश में जन स्वास्थ्य सुविधाओं पर जीडीपी का मात्र एक प्रतिशत ही खर्च किया जा रहा है। स्वास्थ्य पर कुल खर्च प्रदेश में जीडीपी का मात्र 2.6 प्रतिशत है। प्रदेश में लोग औसतन 3741 रुपये साल भर में स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं। मैदानों में यह खर्च 4369 रुपये प्रति वर्ष और पर्वतीय जिलों में मात्र 2932 रुपये प्रति वर्ष है। मुसीबत यह है कि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण लोग निजी चिकित्सा पर अधिक भरोसा कर रहे हैं। 

टिहरी, चंपावत सबसे अधिक संवेदनशील

मौसम बदलाव के आधार पर संवेदनशीलता को लेकर किए गए अध्ययन से सामने आया है कि प्रदेश में सामाजिक और आर्थिक रूप से चंपावत और टिहरी जिले सबसे अधिक संवेदनशील है।

मतलब ये भी है कि संक्रमण की दशा में इन जिलों में हालात सबसे विकट होंगे। हरिद्वार, अल्मोड़ा और बागेश्वर हाई रिस्क जोन में हैं। नैनीताल और देहरादून लो रिस्क जोन में हैं लेकिन इस वजह से की यहां प्रति व्यक्ति आय अधिक है और स्वास्थ्य सुविधाओं तथा परिवहन तक लोगों की पहुंच आसान है।

सोशल डिस्टेंसिंग भी नहीं आसान

अधिक जनसंख्या घनत्व और शादी, बीमार को देखने जाने अस्पताल जाने सहित अन्य मान्यताओं के चलते प्रदेश में सोशल डिस्टेंसिंग इतनी आसान नहीं है।

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