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Dehradun News: श्रीलंका व इंडोनेशिया की तर्ज पर उत्तराखंड में होगा दालचीनी का उत्पादन
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देहरादून। दालचीनी (सिनेमन) क्षेत्र में अग्रणी श्रीलंका व इंडोनेशिया की तर्ज पर उत्तराखंड भी व्यावसायिक खेती अपनाकर उत्पादन को बढ़ावा देने की तैयारी कर रहा है। स्वास्थ्य लाभ व प्राकृतिक स्वाद के लिए वैश्विक बाजार में दालचीनी की मांग लगातार बढ़ रही है। भारत भी श्रीलंका व इंडोनेशिया से आयात करता है।
परफ्यूमरी एवं सगंध अनुसंधान विकास संस्थान (पूर्व नाम सगंध पौधा केंद्र) सेलाकुई की ओर से दालचीनी का उत्पादन बढ़ाने के लिए पहली बार अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया, जिसमें श्रीलंका, इंडोनेशिया के विशेषज्ञों से दालचीनी की खेती, कटाई, प्रसंस्करण व मार्केटिंग क्षेत्र में अपनाए गए पहलों को समझा। उत्तराखंड में अभी तक तेजपात से सिर्फ पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। जबकि छाल यानी दालचीनी का उत्पादन नाम मात्र है।
श्रीलंका व इंडोनेशिया में व्यावसायिक खेती के माध्यम से दालचीनी का उत्पादन किया जाता है। दालचीनी की नर्सरी पॉलीबैग में तैयार की जाती है। एक पौधे से तीन-चार वर्ष में छाल निकलने लगती है। छाल को कॉपिसिंग विधि से काटकर, धोकर, विशेष उपकरणों से निकालकर तैयार कर बाजार में भेजा जाता है। श्रीलंका हर साल 20 हजार मीट्रिक टन सीलोन दालचीनी का उत्पादन करता है। बाजार में 90 फीसदी से अधिक दालचीनी ''''कैसिया'''' होती है, जो चीन, वियतनाम च इंडोनेशिया से आती है। कैसिया तीखी, मोटी छाल वाली और सस्ती होती है। इसके विपरीत, श्रीलंका की दालचीनी पतली, परतदार, मीठी और सुगंधित होती है, जिससे महंगी होती है।
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चंपावत व नैनीताल जिले में तैयार की जा रही सिनेमन वैली
महक क्रांति नीति के तहत चंपावत व नैनीताल जिले में 5200 हेक्टेयर क्षेत्र में सिनेमन वैली विकसित की जा रही है। इससे किसानों के साथ स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।
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उत्तराखंड में दालचीनी उत्पादन की काफी संभावनाएं हैं। खास बात यह है कि इसे जंगली जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। व्यावसायिक खेती से उत्तराखंड दालचीनी कारोबार में वैश्विक स्तर पर पहचान बना सकता है। प्रदेश सरकार की ओर से तेजपात को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई। संस्थान ने तेजपात की नई किस्म तैयार की है। -नृपेंद्र चौहान, निदेशक, परफ्यूमरी एवं सगंध अनुसंधान विकास संस्थान
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परफ्यूमरी एवं सगंध अनुसंधान विकास संस्थान (पूर्व नाम सगंध पौधा केंद्र) सेलाकुई की ओर से दालचीनी का उत्पादन बढ़ाने के लिए पहली बार अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया, जिसमें श्रीलंका, इंडोनेशिया के विशेषज्ञों से दालचीनी की खेती, कटाई, प्रसंस्करण व मार्केटिंग क्षेत्र में अपनाए गए पहलों को समझा। उत्तराखंड में अभी तक तेजपात से सिर्फ पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। जबकि छाल यानी दालचीनी का उत्पादन नाम मात्र है।
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श्रीलंका व इंडोनेशिया में व्यावसायिक खेती के माध्यम से दालचीनी का उत्पादन किया जाता है। दालचीनी की नर्सरी पॉलीबैग में तैयार की जाती है। एक पौधे से तीन-चार वर्ष में छाल निकलने लगती है। छाल को कॉपिसिंग विधि से काटकर, धोकर, विशेष उपकरणों से निकालकर तैयार कर बाजार में भेजा जाता है। श्रीलंका हर साल 20 हजार मीट्रिक टन सीलोन दालचीनी का उत्पादन करता है। बाजार में 90 फीसदी से अधिक दालचीनी ''''कैसिया'''' होती है, जो चीन, वियतनाम च इंडोनेशिया से आती है। कैसिया तीखी, मोटी छाल वाली और सस्ती होती है। इसके विपरीत, श्रीलंका की दालचीनी पतली, परतदार, मीठी और सुगंधित होती है, जिससे महंगी होती है।
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चंपावत व नैनीताल जिले में तैयार की जा रही सिनेमन वैली
महक क्रांति नीति के तहत चंपावत व नैनीताल जिले में 5200 हेक्टेयर क्षेत्र में सिनेमन वैली विकसित की जा रही है। इससे किसानों के साथ स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।
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उत्तराखंड में दालचीनी उत्पादन की काफी संभावनाएं हैं। खास बात यह है कि इसे जंगली जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। व्यावसायिक खेती से उत्तराखंड दालचीनी कारोबार में वैश्विक स्तर पर पहचान बना सकता है। प्रदेश सरकार की ओर से तेजपात को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई। संस्थान ने तेजपात की नई किस्म तैयार की है। -नृपेंद्र चौहान, निदेशक, परफ्यूमरी एवं सगंध अनुसंधान विकास संस्थान