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Dehradun: तीन साल से ऊपर के बच्चों में बार-बार खांसी, हो सकता है चाइल्डहुड अस्थमा, यहां पढ़ें पूरी जानकारी

Sat, 13 Jan 2024 02:33 PM IST
देहरादून ब्यूरो माई सिटी रिपोर्टर, देहरादून
माई सिटी रिपोर्टर, देहरादून Published by: देहरादून ब्यूरो Updated Sat, 13 Jan 2024 02:33 PM IST
सार

खांसी गंभीर होकर अस्थमा का रूप भी ले सकती है। तीन साल से कम उम्र के बच्चे को अगर खांसी के साथ सांय-सांय की आवाज आती है तो आठवें साल तक यह सामान्य हो जाता है। उन्हें लॉन्ग टर्म कंट्रोलर दवाओं की जरूरत नहीं पड़ती।

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Frequent cough in children above three years of age may be childhood asthma Amar ujala Aparajita Program
Cough And Cold (फाइल फोटो)

विस्तार

पटेलनगर स्थित अमर उजाला कार्यालय में शुक्रवार को आयोजित अपराजिता कार्यक्रम में बच्चों के स्वास्थ्य पर चर्चा हुई। इसमें दून अस्पताल के बालरोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर मेजर डॉ. गौरव मुखीजा ने मांओं के सवालों के जवाब दिए।

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डॉ. गौरव ने बताया कि बच्चों को किसी भी तरह की खांसी है तो उसे नजरंदाज न करें। खांसी गंभीर होकर अस्थमा का रूप भी ले सकती है। तीन साल से कम उम्र के बच्चे को अगर खांसी के साथ सांय-सांय की आवाज आती है तो आठवें साल तक यह सामान्य हो जाता है। उन्हें लॉन्ग टर्म कंट्रोलर दवाओं की जरूरत नहीं पड़ती।
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वहीं, तीन से छह साल तक की उम्र के बच्चे में सांय-सांय की आवाज और सोते समय गले से सीटी, धसके वाली खांसी आए तो उसे चाइल्डहुड अस्थमा होने की संभावना होती है। अगर बच्चा तीन साल से अधिक उम्र का है तो अस्थमा से बचाने के लिए अपने बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।
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नियमित दवा न करने से बढ़ती है समस्याI
डॉ. गौरव ने बताया कि बदलते मौसम में जिस घर के लोगों को छींकें आना, एग्जिमा, खांसी बढ़ना, एलर्जी अधिक होती है उस घर के बच्चों में अस्थमा हो सकता है। अस्थमा जेनेटिक होता है। शुरुआत में डॉक्टर रेस्क्यू दवाएं देते हैं लेकिन कुछ समय के बाद यह कंट्रोलर दवाएं हो जाती हैं, जो लंबे समय तक लेनी होती हैं। लेकिन अधिकतर लोग इन कंट्रोलर दवाओं को छोड़ देते हैं तो अस्थमा बढ़ जाता है। इसलिए जरूरी है कि धसके वाली खांसी को नजरअंदाज न करें।
 

अस्थमा से पहले साइनोसाइटस का इलाज जरूरी
अस्थमा और साइनस एक दूसरे से लिंक हैं। इसलिए अस्थमा का इलाज करने से पहले यह भी जानना जरूरी है कि बच्चे को साइनोसाइटस तो नहीं। अगर बच्चे को साइनोसाइटस या जीईआरडी या पोस्ट नेजल ड्रिप है तो इन चीजों का पहले इलाज करना होता है। इसके बाद ही अस्थमा का इलाज कारगर होगा।

नेबुलाइजर और भाप लेना दोनों अलग
नेबुलाइजर और भाप लेना दो अलग प्रकियाएं हैं, जो मरीज की परिस्थिति पर निर्भर करती हैं। नेबुलाइजर छाती से जुड़ी समस्या में इस्तेमाल किया जाता हैं। अस्थमा में नेबुलाइजर कारगर साबित होता है। इसके अलावा अपर रेस्पिरेटरी डिजीज से जुड़ी बीमारियों में भाप का प्रयोग किया जाता हैं। जिसमें गले का इंफेक्शन और साइनोसाइटिस जैसी बीमारियां शामिल हैं।)

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बच्चे के वजन के हिसाब से प्रोटीन लेना जरूरी
डॉ. गौरव ने बताया कि एक बच्चे के वजन के हिसाब से प्रोटीन लेना जरूरी होता है। हालांकि, इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किस खाद्य पदार्थ में कितना प्रोटीन होता है। अंडे, मछली, मांस, नट्स, सोया, ड्राई फ्रूटस, दूध, मीट, मूंगफली में प्रोटीन होता है।

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