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उत्तराखंड हाईकोर्ट: देवस्थानम एक्ट को चुनौती देने वाली सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर निर्णय सुरक्षित 

Mon, 06 Jul 2020 10:50 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 06 Jul 2020 10:50 PM IST
सार

  • हाईकोर्ट मामले में 29 जून से कर रही नियमित सुनवाई

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Chardham Devasthanam Act: Uttarakhand High Court reserved Decision
- फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

नैनीताल हाईकोर्ट में आज वरिष्ठ भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से उत्तराखंड सरकार के चारधाम देवस्थानम एक्ट को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। इसके बाद कोर्ट ने निर्णय सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट इस प्रकरण पर 29 जून से प्रतिदिन सुनवाई कर रही थी। 

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मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार  सुब्रमण्यम स्वामी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि प्रदेश सरकार की ओर से चारधाम के मंदिरों के प्रबंधन को लेकर लाया गया देवस्थानम बोर्ड एक्ट असांविधानिक है। देवस्थानम बोर्ड के माध्यम से सरकार का चारधाम व 51 अन्य मंदिरों का प्रबंधन लेना संविधान के अनुच्छेद 25, 26 व 32 का उल्लंघन है और यह जनभावनाओं के विरुद्ध है।  
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कहा कि इसमें मुख्यमंत्री को भी शामिल किया गया है, जबकि सीएम का कार्य तो सरकार चलाना है और वे जनप्रतिनिधि हैं, उन्हें इस बोर्ड में रखने का कोई औचित्य नहीं है। मंदिर के प्रबंधन के लिए पहले से ही मंदिर समिति का गठन हुआ है। जिस पर कोर्ट ने राज्य सरकार ने पूछा था कि क्या यह एक्ट असांविधानिक है। जवाब में राज्य सरकार ने कहा कि एक्ट बिल्कुल भी असांविधानिक नहीं है और न ही इससे संविधान के अनुछेद 25, 26 और 32 का उल्लंघन होता है। राज्य सरकार ने एक्ट को बड़ी पारदर्शिता से बनाया है। मंदिर में चढ़ने वाला चढ़ावे का पूरा रिकार्ड रखा जा रहा है इसलिए यह याचिका निराधार है और इसे निरस्त किया जाए। 

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रुलक संस्था ने मनुस्मृति और एटकिंशन के गजेटियर का दिया उदाहरण

रुलक संस्था के अधिवक्ता कार्तिकेय हरी गुप्ता ने एक्ट के संबंध में अपना पक्ष रखते हुए कोर्ट में मनुस्मृति के अध्याय सात को प्रस्तुत करते हुए कहा था कि राजा खुद सर्वोपरि है वह अपने दायित्व किसी को भी सौंप सकता है। संस्था ने एटकिंशन के गजेटियर का भी उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया कि बदरीनाथ मंदिर में करप्शन है इसलिए यहां एडमिनिस्ट्रेशन की जरूरत है।

संस्था ने मदन मोहन मालवीय द्वारा 1933 में लोगों से की गई अपील भी कोर्ट में पेश की। जिसके बाद सेक्यूलर मैनेजमेंट और रिलिजियस एक्ट 1939 में लाया गया। जिसमें सेक्यूलर मैनेजमेंट आफ टेंपल राज्य को दिया गया था जबकि रिलिजियस मैनेजमेंट मंदिर पुरोहित को दिया गया है। 

संस्था ने अयोध्या मंदिर का निर्णय भी कोर्ट में पेश किया। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि गजेटियरों को भी साक्ष्य के रूप में माना जा सकता है। जो नया एक्ट राज्य सरकार द्वारा लाया गया है, इसमें कहीं भी हिंदू धर्म की भावनाएं आहत नहीं होती हैं।

संस्था ने इस जनहित याचिका का विरोध करते हुए कहा कि चारधाम यात्रियों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने देवस्थानम बोर्ड बनाकर चारधाम व अन्य मंदिरों का प्रबंध लिया गया है उससे कहीं भी हिदू धर्म की भावनाएं आहत नहीं होती हैं। इसलिए सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर याचिका पूरी तरह से निराधार है और याचिका निरस्त होने योग्य है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने निर्णय को सुरक्षित रख लिया है।

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