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पीसीडीए के रिश्वतखोर सीनियर ऑडिटर को सीबीआई कोर्ट ने सुनाई सात साल कैद की सजा

Thu, 24 Oct 2019 06:40 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 24 Oct 2019 06:40 PM IST
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CBI Court Sentenced PCDA senior auditor to seven years imprisonment for bribe

प्रिंसिपल कंट्रोलर ऑफ डिफेंस अकाउंट (पीसीडीए) दिल्ली के सीनियर ऑडिटर को 20 हजार रुपये रिश्वत लेने के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने सात साल की सजा सुनाई है। विशेष न्यायाधीश सुजाता सिंह की अदालत ने दोषी पर 50 हजार रुपये जुर्माना और रिश्वत की रकम पीड़ित को वापस करने के आदेश भी दिए हैं। 

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इस मुकदमे का निस्तारण रिकॉर्ड चार माह में हुआ है, जो कि प्रिवेंशन ऑफ करेप्शन एक्ट में संशोधन के बाद पहला केस है। सीबीआई के अधिवक्ता सतीश गर्ग ने बताया कि पीसीडीए के सीनियर ऑडिटर आरपी मीणा (निवासी नजफगढ़ दिल्ली) के खिलाफ कर्नल नवरत्न सेवानिवृत्त ने शिकायत की थी।
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कर्नल नवरत्न एक सिक्योरिटी कंपनी चलाते हैं, जो कैंटोनमेंट व अन्य डिफेंस संस्थानों को सिक्योरिटी गार्ड मुहैया कराती है। उनका पांच महीने का 70 लाख रुपये बिल के रूप में पीसीडीए को पास करना था। लेकिन, इसकी एवज में मीणा ने आधा प्रतिशत के हिसाब से 35 हजार रुपये रिश्वत मांगी। 
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मीणा ने कर्नल नवरत्न को काफी परेशान किया। उन्होंने चार अप्रैल को सीबीआई को इस संबंध में शिकायत की। मीणा ने रिश्वत की रकम अपने बैंक खाते में जमा कराने को कहा था। मुकदमा दर्ज करने के बाद सीबीआई ने ट्रैप तैयार कर लिया और एक टीम नजफगढ़ में भी तैनात कर दी। कर्नल नवरत्न ने मीणा के बैंक खाते में 20 हजार रुपये जमा कराए। जैसे ही मीणा ने इसकी पुष्टि की तो सीबीआई ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

अधिवक्ता सतीश गर्ग ने बताया कि इस मुकदमे में सीबीआई ने दो माह बाद ही चार्जशीट दाखिल कर दी। इसके बाद मुकदमे का ट्रायल शुरू हुआ तो सीबीआई ने कुल 16 गवाह पेश किए। जबकि, मीणा की ओर से अपने बचाव में एक भी गवाह प्रस्तुत नहीं किया गया। ऐसे में अदालत ने इन गवाहों और वैज्ञानिक साक्ष्यों के परीक्षण के आधार पर मीणा को रिश्वत लेने का दोषी ठहराते हुए सजा का ऐलान कर दिया। 

पहला केस जिसमें नहीं रंगे गए नोट 
देहरादून एंटी करप्शन ब्रांच सीबीआई का यह पहला केस था जिसमें कोई नोट फिनेफ्थेलीन में नहीं रंगा गया। यह केस टेक्नोलॉजी के आधार पर ही दर्ज हुआ। इसमें शिकायतकर्ता और रिश्वत लेने वाला पांच अप्रैल 2019 से पहले कभी नहीं मिले थे। खाते को भी सीबीआई ने कई बार वेरिफाई कराया और फिर सभी रिकॉर्डिंग आदि को जांच के लिए सीएफएसएल भेजा गया था। 

एक्ट में संशोधन के बाद पहला केस 
दरअसल, इस मुकदमे में 16 जून 2019 को चार्जशीट दाखिल की गई। इसी दिन प्रिवेंसन ऑफ करेप्शन एक्ट में संशोधन हुआ कि सभी नए केसों का दो साल के भीतर निपटारा किया जाना है। लिहाजा, अदालत ने इस केस को पहला केस माना और सीबीआई ने इसे चार माह में डिसाइड कर दिया।

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