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कामयाबी: वनस्पति वैज्ञानिकों ने विकसित की नीम की छह प्रजातियां, इन उत्पादों में होता है नीम के तेल का इस्तेमाल

Wed, 10 Aug 2022 08:39 AM IST
शाहरुख खान अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून Published by: शाहरुख खान Updated Wed, 10 Aug 2022 08:39 AM IST
सार

वन अनुसंधान संस्थान के वनस्पति विज्ञानियों ने नीम की छह नई प्रजातियां विकसित कीं हैं। नई प्रजातियों में अत्यधिक उत्पादन के साथ ही 18 प्रतिशत अधिक तेल उत्पादन की क्षमता है। दवाइयों, पेस्टिसाइड और कॉस्मेटिक उत्पादों में बड़े पैमाने पर नीम के तेल का इस्तेमाल होता है। 

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Botanists have developed six species of neem oil is used in these products
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : istock

विस्तार

वन अनुसंधान संस्थान के वनस्पति विज्ञानियों ने नीम की छह नई प्रजातियां विकसित की हैं। इससे उत्तराखंड समेत तमाम राज्यों में नीम का अधिक से अधिक उत्पादन करने के साथ ही किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जा सकेगा। नई प्रजातियां सामान्य नीम की तुलना में तीन साल पहले ही फल देना शुरू कर देंगे। सामान्य नीम के पौधे छह साल में निबौली का उत्पादन करते हैं। 
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नई प्रजातियों में सामान्य नीम के पौधों की तुलना में तेल उत्पादन का प्रतिशत भी बहुत अधिक पाया गया है। वन अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वनस्पति विज्ञानी डॉ. अशोक कुमार के मुताबिक नई प्रजातियों से नीम के सामान्य पौधे की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक तेल का उत्पादन होगा। परिणामस्वरूप तेल की मांग को काफी हद तक पूरा किया जा सकेगा। 
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सभी प्रजातियों में अजादरेक्टिन तत्व की मात्रा सामान्य की तुलना में बहुत अधिक पाई गई है। सामान्य नीम के बीजों में जहां अजादरेक्टिन की मात्रा 1000 पीपीएम है। वहीं नई प्रजातियां में इसकी मात्रा दस हजार पीपीएम पाई गई है। संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक सामान्य नीम के पौधे से निकलने वाली निबौली एक किलोग्राम निबौली से जितना तेल का उत्पादन होगा, उतना ही तेल नई प्रजातियों की नीम से मात्रा 300 ग्राम नीम के बीज तेल का उत्पादन किया जा सके। 
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देश में 35 लाख टन के बीजों का उत्पादन, मांग के सापेक्ष 15 प्रतिशत की आपूर्ति 
वन अनुसंधान संस्थान के वनस्पति विज्ञानियों की मानें तो मौजूदा समय में देश में सिर्फ 35 लाख टन निबौली और सात लाख टन तेल का उत्पादन हो रहा है जो मांग के अनुरूप बहुत कम है। देश में यूरिया के उत्पादन में नीम के तेल की मांग के साथ ही एंटीसेप्टिक, एंटीफंगल, एंटी वायरल ओर एंटीबैक्टीरियल दवाइयों को बनाने के साथ ही नीम के तेल का इस्तेमाल कॉस्मेटिक वस्तुओं के बनाने में भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। 

अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया के साथ ही अमेरिका तक पहुंचा नीम का पेड़ 

डॉ. अशोक कुमार के मुताबिक वैसे तो नीम एक ऐसी प्रजाति का पेड़ है जो भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, इंडोनेशिया, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देशों में पाया जाता है, लेकिन अब नीम का पेड़ अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, अमेरिका महाद्वीप तक पहुंच गया है। भारत समेत पुरी दुनिया में नीम के बीजों और तेल की भारी मांग को देखते हुए चीन जैसे देशों में कई करोड़ हेक्टेयर में नीम की खेती की जा रही है। अमेरिका, यूरोपीय देशों के साथ चीन जैसे देशों में नीम को लेकर बड़े पैमाने पर शोध भी किए जा रहे हैं।

वेदों में सर्वरोग निवारण के रूप में उल्लेखित है नीम 
नींद एक ऐसा वृक्ष है जिसका उल्लेख वेदों में भी मिलता है। नीम के वृक्ष को वेदों में सर्वरोग निवारिणी के रूप में उल्लेखित किया गया है। वेदों में इसे दैव वृक्ष माना गया है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जब अमृत को स्वर्ग ले जया जा रहा था तो अमृत की कुछ बूंदे छलककर नीम के पेड़ पर पड़ी थी जिसके चलते नीम अन्य पेड़ों की तुलना में बहुत अधिक गुणकारी है। 
 
भारत समेत दुनिया के कई देशों में निबौली और नीम के तेल के भारी मांग को देखते हुए नीम की छह नई प्रजातियां विकसित की गई हैं। नई प्रजातियां सामान्य की तुलना में कई गुना बेहतर है। विकसित की गई नई प्रजातियों से निबौली और तेल का अधिक उत्पादन होगा। नई प्रजातियों से महज तीन साल में बीजों का उत्पादन किया जा सकेगा। 
- डॉ. अशोक कुमार, वनस्पति विज्ञानी, वन अनुसंधान संस्थान
 
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