विशाल भारद्वाज ने कही दिल की बात, बोले-किताबों से सीखी सिनेमा की बारीकियां, जिद ने दिलाया मुकाम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बॉलीवुड में हैदर, ओमकारा, मकबूल, डेढ़ इश्किया, सात खून माफ और कमीने समेत कई हिट फिल्में लिखने और निर्देशन करने वाले विशाल भारद्वाज का किसी फिल्म इंस्टीट्यूट या ट्रेनिंग सेंटर से कोई नाता नहीं रहा।
उन्होंने बताया पहले कविताएं, फि र संगीत और उसके बाद सिनेमा की सारी बारीकियां उन्होंने किताबों से पढ़कर ही सीखी हैं। मैं बहुत जिद्दी था। इसलिए सोचा कि देखता हूं पहले मैं टूटता हूँ या तकनीक। इसी जिद ने मुझे ये मुकाम दिलाया।
रविवार को देहरादून लिटरेचर फेस्टिवल के ‘वर्क ऑफ परफेक्शन पोएट्री, म्यूजिक एंड सिनेमा’ सत्र में पहुंचे विशाल भारद्वाज ने अपने संघर्ष और कॅरियर के बारे में बहुत कुछ बताया। कहा कि मैं डायरेक्टर जरूर हूं, लेकिन खुद को एक कवि और संगीत में ज्यादा फिट समझता हूं।
मैंने कहीं भी फिल्म डायरेक्शन या फिल्म लेखन का प्रशिक्षण नहीं लिया। कहानियां, शेक्सपियर के नाटकों को पढ़कर सीखीं। उनके कथानक, पात्रों और स्थानों को मैंने अपने देश के कई स्थानों में फिट किया।
प्रत्येक विवि में होने चाहिए कोर्स
इसके बाद जो कहानियां लिखीं और फिल्म बनाई, वे बॉलीवुड में सफल फिल्मों में से हैं। उन्होंने आने वाली पीढ़ी के लिए भी कहा कि बॉलीवुड खुद को साबित करने का बहुत अच्छा प्लेटफॉर्म है, लेकिन ऐसे नहीं कि जैसे मैं यहां आया। क्योंकि, यदि किसी प्रशिक्षण के बाद यहां पर संभावनाएं तलाशी जाएं तो यह मेरे काम से भी बेहतर काम होगा। इसलिए प्रशिक्षण जरूरी है।
विशाल भारद्वाज ने इस दौरान शिक्षा व्यवस्था से भी शिकायत होने की बात कही। कहा कि बेशक फिल्में हमारे देश में ज्यादा बनती हैं। लेकिन परफेक्शन की बात करें तो पश्चिम के सिनेमा में ज्यादा हैं। इसका कारण है कि वहां पर विवि में इसे कॅरियर विकल्प के तौर पर पेश किया जाता है।
अंगूठा न टूटता तो किसी बैंक में काम कर रहा होता
भारद्वाज पहले क्रिकेटर बनना चाहते थे। उन्होंने स्टेट की अंडर-19 टीम में खेला भी। लेकिन, एक मैच के पहले उनका अंगूठा टूट गया था। उसके बाद उन्हें मैच छोड़ना पड़ा। अगले साल पिता का देहांत हो गया। इसके बाद सोच लिया कि संगीत करना है। फिर कॉलेज में उनकी मुलाकात रेखा से हुई और देखते ही देखते वे संगीत, कविताओं और फिर फि ल्मों में खो गए। सबसे पहला गाना उन्होंने ‘चड्ढी पहन के फूल खिला है’, रिकॉर्ड किया था। जिसका संगीत उनका खुद का था।
अच्छे संगीत की कोई सीमा नहीं होती: रेखा भारद्वाज
देहरादून लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे एवं अंतिम दिन (रविवार) मशहूर बॉलीवुड गायिका रेखा भारद्वाज ने दर्शकों से सीधा संवाद किया। उन्होंने फि ल्म और संगीत से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। साथ ही अपने सुपरहिट गीत भी सुनाए। इस दौरान उन्होंने कहा कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती। विदेशों में भी भारतीय शास्त्रीय संगीत के हजारों कद्रदान हैं। अपने देश में भी बड़े पैमाने पर पश्चिमी संगीत सुना जाता है। अमर उजाला इस तीन दिवसीय फेस्टिवल का मीडिया पार्टनर रहा।
‘जुबां पर लागा म्यूजिक फॉर द सोल’ सत्र में रेखा भारद्वाज ने अपने जीवन और कॅरियर से जुड़ी कई बातें साझा की। कहा कि वह बचपन से ही गायिका बनना चाहती थी। छह वर्ष की उम्र से उन्होंने संगीत सीखना और स्टेज पर परफॉर्म करना शुरू कर दिया था। दिल्ली में गंधर्व संगीत विद्यालय से सीखने के बाद उन्होंने गुरु अमरनाथ से शास्त्रीय गायन की विधिवत दीक्षा ली। दर्शकों की फरमाइश पर उन्होंने ‘नमक इश्क का’, ‘ससुराल गेंदा फूल’ और ‘कबीरा’ समेत अपने कई सुपरहिट गीत सुनाए।
हम दोनों को पसंद है मसूरी
गायिका रेखा भारद्वाज ने कहा कि मसूरी का मौसम मुझे और विशाल दोनों को बहुत पसंद है। यहां की खूबसूरत वादियां हमें बहुत लुभाती हैं। यहां आकर हम दोनों ऊर्जा से भर जाते हैं। एयरपोर्ट से दून के बीच का नजारा बेहद शानदार है।
खराब हो रही बॉलीवुड की भाषा
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय में बॉलीवुड की भाषा काफी खराब हुई है। कई बार लगता है कि हिंदी और उर्दू के शब्द डिक्शनरी से सीधे उठाकर गीतों के बीच में डाल दिए गए हैं।