वाह... औली, खूबसूरती सिर्फ सुनी थी
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बर्फ की चादर से ढकी खूबसूरत औली को देखकर पर्यटक भी अभिभूत हो गए। औली पहुंचते ही सभी के मुंह से निकला वाह...औली। खूबसूरती सिर्फ सुनी थी, आज देख लिया।
विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल औली में राष्ट्रीय जूनियर स्कीइंग प्रतियोगिता की शुरुआत के साथ ही पर्यटकों के आने का सिलसिला शुरू हो गया। भारी बर्फबारी के बाद रास्ता खराब होने के बावजूद लोग सड़क और रोपवे के जरिये औली पहुंचकर बर्फ के बीच खेल के रोमांच का आनंद लेते नजर आए।
कोलकाता से आए अरुनव दास ने बताया कि बीते रोज बारिश और बर्फबारी से रास्ता बंद हो गया था, जिसके बाद लौटने का प्रोग्राम था। प्रतियोगिता शुरू होने की बात पता चली तो पत्नी और बेटे के साथ आ गए हैं। अरुनव की पत्नी अनन्या ने बताया कि वह जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश गए हैं, लेकिन ऐसी खूबसूरती वहां नहीं देखी। यहां का नजारा बहुत शानदार है, जिसके बारे में सिर्फ सुना था। आज देखा और खूब इंज्वॉय किया।
खूब चले जूडो के दांव, अब स्कीइंग में पांव
तीखे स्कीइंग ढलानों पर काबरा जब स्कीइंग करती हैं, तो उनकी रफ्तार और बर्फ की चादर पर फिसलने की बेहतरीन पकड़ देख हर कोई दंग रह जाता है।
नेशनल जूनियर स्कीइंग चैंपियनशिप में जम्मू और कश्मीर की यह खिलाड़ी मजबूती से पांव जमा रही है। लेकिन यह काबरा का सिर्फ आधा परिचय है। स्कीइंग से पहले यह खिलाड़ी जूडो में भी खूब दांव चल चुकी है। काबरा देश की उन चुनिंदा खिलाड़ियों में से एक है, जो दो अलग खेलों में नेशनल लेवल पर प्रतिभाग कर रही हैं।
हाल ही में देहरादून में संपन्न नेशनल यूथ एंड जूनियर जूडो चैंपियनशिप में काबरा ने कांस्य पदक हासिल किया था। काबरा ने अमर उजाला को बताया कि सात साल की उम्र से वह जूडो सीख रही हैं। यही उनका पसंदीदा खेल भी है।
जूडो की कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में वह भाग ले चुकी हैं। काबरा बताती हैं कि जूडो के साथ स्कीइंग कब उनका खेल बन गया, पता ही नहीं चला। बताया कि तीन साल पहले शौकिया तौर पर स्कीइंग करनी शुरू की। धीरे-धीरे अभ्यास किया तो इसमें भी हाथ रमने लगा। हालांकि, अब भी काबरा जूडो को ही ज्यादा वक्त देना पसंद करती हैं। काबरा ने पिछले साल स्कीइंग में दो पदक जीते थे। इस बार उनकी निगाहें स्वर्ण पर हैं।
घर नहीं जा सकी काबरा
काबरा नेशनल यूथ एंड जूनियर जूडो चैंपियनशिप के लिए 20 से 24 फरवरी तक देहरादून में थी। यहां से 25 फरवरी को वह जम्मू पहुंची, लेकिन स्टेशन पहुंचते ही उन्हें मालूम हुआ कि उन्हें स्कीइंग के लिए औली निकलना है। सब कुछ इतनी जल्दी में हुआ कि काबरा अपने घर भी नहीं जा सकीं। स्टेशन से ही टीम संग औली आ गई।
‘शानदार है औली का स्लोप’
काबरा पहली बार स्कीइंग के लिए औली आई हैं। उन्होंने कहा कि औली का स्लोप बहुत शानदार है और यह जगह भी बहुत सुंदर है। उनकी साथी इकरा भी पहली बार औली आकर बहुत खुश हैं।
इससे पहले काबरा नेशनल यूथ एवं जूनियर जूडो चैंपियनशिप में प्रतिभाग करने देहरादून आई थीं। उन्होंने कहा कि देहरादून बहुत खूबसूरत है। वह दोबारा दून आना चाहती हैं। बताया कि पिछली बार हरिद्वार घूमने का मौका मिला, लेकिन मसूरी न जा पाने का मलाल है।
हिमाचल की सबसे बड़ी टीम
जूनियर एल्पाइन एंड सीनियर क्रास कंट्री स्कीइंग नेशनल चैंपियनशिप में सबसे बड़ी टीम हिमाचल प्रदेश की है। हिमाचल की दो टीमों में कुल 31 खिलाड़ी शामिल हैं। जम्मू कश्मीर की टीम के 24 खिलाड़ी पहुंचे हैं। इसके अलावा भारतीय सेना, आईटीबीपी, यूपी, पंजाब, दिल्ली, गढ़वाल मंडल विकास निगम की टीमें भी पांच दिवसीय प्रतियोगिता में भाग ले रही हैं।
एल्पाइन स्कीइंग के लिए बेस्ट है औली
चारों ओर बर्फ और इसके बीच शानदार, खूबसूरत स्लोप (ढलान)। यह औली के लिए कुदरत का तोहफा है। एशिया में तो एल्पाइन स्कीइंग के लिए औली से बेहतर ढलान कोई नहीं। यूरोपीय देशों से भी ये कहीं कमतर नहीं है।
आस्ट्रिया में कई शानदार स्लोप हैं, लेकिन औली के स्लोप भी बेहतरीन हैं। यह कहना है सैफ गेम्स में भारत के लिए दो स्वर्ण पदक जीतने वाले जम्मू एवं कश्मीर के आरिफ खान का।
भारत की राष्ट्रीय स्कीइंग टीम के खिलाड़ी आरिफ खान जूनियर खिलाड़ियों को गाइड करने के लिए औली आए हैं। महज चार साल की उम्र से स्कीइंग सीखने वाले आरिफ अपने परिवार की दूसरी पीढ़ी के स्कीयर हैं।
आरिफ ने बताया कि उनके पिता ने 1975 में स्कीइंग शुरू की थी, जबकि उन्होंने 1994 से। अब तक वह 72 अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेल चुके हैं। आठ राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 6 स्वर्ण और 2 रजत पदक उनके नाम हैं। 2014 में गुलमर्ग में हुई सीनियर सलालम चैंपियनशिप में भी वे स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।
आरिफ ने बताया कि कश्मीर के गुलमर्ग में औली से दो-तीन गुना बड़े स्लोप हैं, लेकिन औली जैसी ढलान वहां नहीं है। बताया कि औली आना उन्हें बहुत पसंद है। कहते हैं कि दुनिया में औली की अलग पहचान है बस जरूरत है तो सुविधाओं और फंडिंग की। आरिफ ने कहा कि यूरोपीय देशों में आइस स्केटिंग को बहुत प्रमोट किया जाता है और सुविधाएं भी बहुत मिलती हैं। ऐसी सुविधाएं यहां मिलें तो हर साल अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता हो सकती है।
बर्फीली ढलानों पर उतरी नन्ही परी
बर्फ पर लहराती और रफ्तार के रोमांच को पार करती याशिका बर्फीले खेल की नन्हीं परी हैं। पहली बार नेशनल जूनियर स्कीइंग चैंपियनशिप में प्रतिभाग कर रही यशिका उम्र में भले छोटी हों, लेकिन उनका जज्बा बड़े-बड़ों को मात देने वाला है। इन दिनों यशिका चैंपियनशिप की तैयारी के लिए कड़े अभ्यास में जुटी हैं।
हिमाचल प्रदेश की टीम में शामिल 13 साल की यशिका दिखने में जितनी मासूम हैं, बर्फ की ढलान पर उतनी ही तेज। बैडमिंटन की शौकीन यशिका ने बताया कि वह शिमला के आनंद विलास स्थित सत्य साईं स्कूल में कक्षा नौ की छात्रा हैं। बताया कि घर के पास नरकुंडा में बर्फ पड़ती है। उनके पिता देवेंद्र ठाकुर स्कीयर हैं।
उन्हें देखकर ही स्कीइंग से जुड़ने की प्रेरणा मिली। बताया कि पहले शौकिया तौर पर स्कीइंग शुरू की। बाद में पापा ने उन्हें सिखाना शुरू किया। अभी उन्हें इस खेल में एक साल ही हुआ है, लिहाजा पहली चैंपियनशिप में वह चिल्ड्रन कैटेगरी में प्रतिभाग करने वाली हैं। यशिका ने बताया कि बैडमिंटन उनका पसंदीदा खेल था, लेकिन इसमें आगे सिखाने वाला नहीं मिला तो स्कीइंग अपना लिया।