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कारगिल के जाबांज से सुनिए जंग की आंखो देखी

Sat, 26 Jul 2014 01:44 AM IST
राजेश शर्मा/अमर उजाला, रुड़की
राजेश शर्मा/अमर उजाला, रुड़की Updated Sat, 26 Jul 2014 01:44 AM IST
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armyman told kargil war story

शिवाजी कालोनी में रहने वाले गढ़वाल राइफल्स के सेवानिवृत्त सूबेदार दिगंबर सिंह नेगी की आंखों में कारगिल की जंग का एक-एक नजारा आज भी ऐसे ही घूम रहा है जैसा उन्होंने जंग के समय कश्मीर में तैनाती के दौरान देखा था।

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वे 18 गढ़वाल राइफल्स के सूबेदार के रूप में अपनी टोली के साथ श्रीनगर में तैनात थे। 17 मई, 1999 को हेड क्वार्टर से द्रास की तरफ कूच करने का मैसेज आया। पूरी बटालियन मोर्चा लेने के लिए द्रास की ओर बढ़ी और सोपोर में कैंप किया।
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19 मई 1999 को वे मोर्चा लेने के लिए तरोलिंग पहाड़ी की ओर कूच कर गए। घुसपैठिये पहले से ही पहाड़ पर सुरक्षित स्थानों में छिपकर बैठे थे और एक-एककर मोर्चा लेने के लिए बढ़ रहे भारतीय जवानों को निशाना बना रहे थे। ऐसे में उनकी टोली ने भी मोर्चा संभाला।

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पैर जख्मी होने था और लड़ते रहे जंग

armyman told kargil war story

नेगी बताते हैं कि उनकी ड्यूटी फायर बेस कमांडर के रूप में थी। उन्हें हमला कर रहे दुश्मनों को भ्रमित करना था। बखूबी उन्होंने अपने काम को अंजाम दिया। उनकी टोली में शामिल जवानों ने कई दुश्मनों को ढेर किया।

इसी बीच आगे बढ़ते हुए उनकी टोली पर कहीं दूर से निशाना बनाकर हमला किया गया। इस हमले में एक गोला उनके बहुत नजदीक आकर गिरा जिसकी चपेट में आने से उनका एक पैर जख्मी हो गया इसके बावजूद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अंत तक मुकाबला करते रहे।

अगले दिन उन्हें दिल्ली रैफर कर दिया गया। जहां उपचार के दौरान उन्हें सूचना मिली कि उनकी बटालियन के 9 जवान दुश्मन से मोर्चा लेते हुए शहीद हो गए हैं।

आज भी जोश से भर देती है जंग

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अपने आवास पर अमर उजाला से वार्ता करते हुए दिगंबर सिंह नेगी बताते हैं आज भी जब उन्हें कारगिल की जंग की याद आती है तो ऐसा ही जोश भर जाता है जैसा फौज में रहता था।

वर्ष 2003 में देहरादून में तैनाती के दौरान रिटायर हुए नेगी का बड़ा बेटा भी फौज में हैं जबकि दो बेटे सिविल क्षेत्र में सेवारत है।

सैनिकों का उम्र भर ध्यान रखे सेना
दिगंबर सिंह नेगी का कहना है कि जो जवान शहीद हो गए उनके परिवारों का तो सेना को पूरा ध्यान रखना ही चाहिए। जो घायल हुए उनके परिजनों की भी सुध लेनी चाहिए।

हालांकि उन्हें सेना से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन वे ऐसी नियमित व्यवस्था चाहते हैं ताकि सैनिकों के परिवारों की सुविधाओं का नियमित रूप से ध्यान रखें।

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