{"_id":"ee9f2df194f56d7829bbc0cdc4d6baf1","slug":"appointment-limbo-in-politics","type":"story","status":"publish","title_hn":"सियासत की कुर्सी ने कुचले अधिकारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सियासत की कुर्सी ने कुचले अधिकारी
अमर उजाला, अरुणेश पठानिया, देहरादून
Updated Mon, 02 Sep 2013 09:08 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तराखंड के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के डीजी डा. योगेश शर्मा शनिवार को सेवानिवृत हो गए हैं। डीजी पद पर स्थाई तैनाती को लेकर समय से डीपीसी न हो पाने के चलते बतौर कार्यवाहक महानिदेशक डा. जीएस जोशी को प्रभार सौंपा गया है।
विज्ञापन
डीजी पद पर राजनीतिक दखल का अंदाजा इसी से लगता है कि बीते एक वर्ष में यह पांचवें डीजी का प्रभार है, जिससे सरकार की राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विज्ञापन
हाईकोर्ट से तैनाती आदेश
यह पहली बार नहीं है जब स्वास्थ्य के डीजी की डीपीसी का मामला लटका है। कई बार हाईकोर्ट से तैनाती आदेश मिलने की किरकिरी झेल चुकी सरकारी हर बार डीपीसी करवाने में देरी करती है।
विज्ञापन
बीते एक वर्ष में डीजी की स्थाई तैनाती पर गौर किया जाए तो तैनाती को देखा जाए तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। 31 जुलाई 2012 को डा. आरपी भट्ट डीजी पद से रिटायर हुए, जिसके बाद तुरंत डीपीसी के बजाए पहले भी कार्यवाहक डीजी रह चुके डा. सीपी आर्य को प्रभार दिया गया।
सात दिन के लिए डीजी बने
जनवरी 2013 में स्थाई डीजी डा. आरके पंत की हुई, जो कोर्ट के आदेश के बाद महज सात दिन के लिए डीजी बने। डा. पंत हटे तो वरिष्ठता सूची में सबसे आगे डा. योगेश शर्मा डीजी बने।
अब एक बार फिर डीपीसी में देरी से डा. जीएस जोशी को कार्यवाहक पद दिया गया। अभी विभाग में सबसे वरिष्ठ निदेशक डा. पांगति हैं, लेकिन डीपीसी में लगातार देरी हो रही है जबकि फरवरी में उनकी रिटायरमेंट है।
सैनिक कल्याण निदेशक की तैनाती में खींचतान जारी
सैनिक कल्याण निदेशक के कार्यवाहक जिम्मेदारी का पदभार संभाल रहे कर्नल आरपी सिंह का कार्यकाल शनिवार को पूरा हो गया।
स्थाई निदेशक को लेकर चल रही राजनीति से पद पर स्थाई निदेशक की तैनाती नहीं हो पा रही है। गौरतलब है कि तीन वर्ष से निदेशक का पद खाली है, जबकि निदेशक चयन प्रक्रिया पूरी करने के बावजूद विभागीय मंत्री के अड़ने से तैनाती आदेश नहीं हो पा रहे हैं।
मंत्री अभ्यर्थी चयन से खुश नहीं
एक माह से शासन तैनाती का प्रस्ताव तैयार कर चुका है लेकिन मंत्री अभ्यर्थी चयन से खुश नहीं हैं। राजनीतिक खींचतान के चलते स्थाई निदेशक के शासनादेश नहीं हो पा रहे हैं। इस बीच अब कार्यवाहक निदेशक का कार्यकाल समाप्त होने से फिर सबसे वरिष्ठ अधिकारी को कमान सौंपी गई है।