फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   anwal secure border also

भेड़ चराने वाले अनवाल सीमाओं के प्रहरी भी

Mon, 06 Jun 2016 04:16 PM IST
भक्त दर्शन पांडेय/ अमर उजाला, बागेश्वर
भक्त दर्शन पांडेय/ अमर उजाला, बागेश्वर Updated Mon, 06 Jun 2016 04:16 PM IST
विज्ञापन
anwal secure border also
anwal, secure, border - फोटो : concept photo

बुग्यालों में बर्फ पिघलते ही अनवालों ने भेड़ों के साथ उच्च हिमालयी क्षेत्रों की ओर माइग्रेशन शुरू कर दिया है। यह अनवाल भारत-चीन के सीमावर्ती क्षेत्र में पूरे छह माह तक रहेंगे।

विज्ञापन


उच्च हिमालयी क्षेत्र से लेकर तराई तक जाने वाले अनवालों को भले ही आम लोग भेड़पालक के रूप में जानते हों, लेकिन सीमांत में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखने के कारण यह सीमांत के प्रहरी भी कहे जाते हैं।
विज्ञापन


उच्च हिमालयी क्षेत्र में भेड़ पालकर उनका व्यवसाय करने वाले लोगों को कुमाऊं-गढ़वाल में अनवाल, कश्मीर में मर्ग कहा जाता है। उत्तराखंड में बागेश्वर, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, चमोली के हजारों जनजातीय परिवार इस व्यवसाय के साथ जुड़े हैं, जो ऊन बेचकर आजीविका चलाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


हर साल मई में अनवाल परिवारों के पुरुष अपनी भेड़ों को लेकर उच्च हिमालयी क्षेत्रों की तरफ निकलते हैं। बुग्यालों में कई जगह झोपड़ियां या तंबू गाढ़कर वह करीब छह महीने तक प्रवास करते हैं। आटा, गुड़, चना, सत्तू को भोजन के लिए साथ रखते हैं। इस सामान का ढुलान भेड़ों की पीठ पर किया जाता है।

छह माह के प्रवास में अनवाल भेड़ों के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण करते रहते हैं। उत्तराखंड में पिथौरागढ़, बागेश्वर से लेकर चमोली, उत्तरकाशी तक द्यारा, आली, वेदिनी सहित व्यास, जोहार, चौदास, माणा, दारमा, नीति, मिलम घाटी से लगे 18 हजार फीट की ऊंचाई वाले बुग्यालों तक जाते हैं। भेड़ पालकों के दूसरे समुदाय हिमाचल प्रदेश, कश्मीर में भी फैले हैं।

उत्तरकाशी जिले के अनवाल हिमाचल के बुग्यालों तक जाते हैं, जबकि शेष तीन जिलों के अनवाल मिलम सहित अन्य घाटियों और दर्रों के रास्ते कुमाऊं-गढ़वाल के बीच आवागमन करते हैं। इस दौरान प्रत्येक समूह कई सौ किमी तक की यात्रा करता है। अनवाल अक्तूबर के बाद भेड़ों की ऊन उतारकर लौटने लगते हैं। छह माह तक प्रवास में रहने वाले यह अनवाल सीमांत में होने वाली गतिविधियों पर भी नजर रखते हैं।


भेड़ों के साथ सीमांत तक जाने वाले अनवाल संचार विहीन क्षेत्रों में निगरानी, सूचना का काम भी करते हैं। कारगिल में दुश्मनों के घुसपैठ की सूचना सबसे पहले चरवाहों ने ही दी थी। छह महीने तक सीमा पर होने वाली गतिविधियों की सूचना देते रहने के कारण इनको सीमांत का प्रहरी भी कहा जाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed