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ये सुर बिगाड़ सकते हैं नमो राग की तान

Thu, 03 Apr 2014 05:38 PM IST
अजित सिंह राठी/अमर उजाला, देहरादून
अजित सिंह राठी/अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 03 Apr 2014 05:38 PM IST
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anger in uttarakhand bjp

अनमने मन से बचदा तो माने मगर भाजपा का आंतरिक खतरा टला नहीं है। कई और बगावती सुर पार्टी के राग जीत को बेसुरा बना सकते हैं।

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अभी तीन बड़े विद्रोही पार्टी का सिरदर्द बने हैं। विडंबना यह है कि पार्टी का प्रदेश या तो इस हालात को अनदेखा कर रहा है या उससे निपटने में नाकाम है।

समन्वय के अभाव से जूझ रहा नेतृत्व
टिकट बंटवारे के लिए पैनल भेजने से लेकर अब तक भाजपा का प्रदेश नेतृत्व कुशल प्रबंधन के साथ ही पार्टी नेताओं के साथ समन्वय के अभाव से जूझ रहा है।

किसी तरह से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह पूर्व केंद्रीय मंत्री बची सिंह रावत को तो समझा-बुझाकर वापस ले आए लेकिन पौड़ी संसदीय सीट पर मोहन सिंह गांववासी, हरिद्वार पर मौजूदा विधायक मदन कौशिक, टिहरी सीट पर पूर्व विधायक मुन्ना सिंह चौहान खुद की खींची लकीर से पीछे लौटने को तैयार नहीं है।

नाराज लोगों के लिए कोई योजना नहीं
दरअसल, पार्टी की यह रणनीतिक चूक ही है कि बगावत की राह पर आगे बढ़ रहे नेताओं को वापस लाने की कोई योजना भी नहीं बनाई। केंद्रीय नेतृत्व ने बात तो की लेकिन अभी बचदा के अलावा शेष सभी नेताओं के मूड में नरमी के संकेत नहीं मिल रहे है।
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रणनीतिक तौर पर चूक इसलिए भी हुई कि कौशिक, मुन्ना, गांववासी को मनाने के लिए ठोस प्रयास नहीं हुए। केंद्रीय नेतृत्व टिकटों के रार में फंसा है और प्रदेश नेतृत्व की ये नेता सुन नहीं रहे हैं।
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जो सुलझा सकते हैं उनके पास समय नहीं
सच बात तो यह है कि प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी इस समस्या को सुलझा सकते हैं लेकिन वे अपने चुनावों में ही मशगूल हैं।

एक बड़ा माध्यम पार्टी के राष्ट्रीय सचिव त्रिवेंद्र सिंह रावत बन सकते है लेकिन वह प्रदेश से लगातार बाहर चल रहे हैं। वैसे भी प्रदेश नेतृत्व के साथ उनका बहुत बेहतर समन्वय नहीं है।


वह इसलिए भी संकटमोचक हो सकते हैं क्योंकि वह राष्ट्रीय सचिव होने के नाते राजनाथ सिंह के सीधे संपर्क में रहते हैं। पार्टी अध्यक्ष के साथ त्रिवेंद्र का पुराना संबंध भी है।

अब यदि जल्द ही यह झगड़ा कंट्रोल नहीं हुआ तो लोकसभा चुनाव में इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है।

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