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90 लाख साल पहले शिवालिक में रहे गिब्बन लंगूर के पूर्वज

Sat, 29 Jul 2017 12:17 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 29 Jul 2017 12:17 PM IST
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Ancestor of Gibbon Langur lived in Shivalik
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आज गिब्बन और सियामांग नाम के जो लंगूर हैं उनके पूर्वज कपि मानव कृष्णापिथिकस की बस्तियां शिवालिक की छोटी पहाड़ियों पर 90 लाख साल पहले आबाद रही हैं।

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ढाई सौ किमी फैली शिवालिक रेंज में इसकी निशानदेही होनी शुरू हो गई है। हिमाचल प्रदेश के विलासपुर जिले के हरीतलयंगर में कृष्णापिथिकस के नीचे के दो दांत मिलने के बाद अब इस कपि मानव के अवशेषों की देहरादून (ऋषिकेश), पौड़ी और टिहरी गढ़वाल तीन जिलों में लगने वाले इलाके लक्ष्मणझूला और नैनीताल जिले के कालगढ़ में तलाश की जा रही है। माना जाता है कि ये कपि मानव यूरोप से पलायन करके यहां आए थे, लेकिन जब हिमालयी श्रंखला ऊंची उठने लगी और शिवालिक में ठंड बढ़ी तो यहां का पुश्तैनी इलाका छोड़कर चल दिए।
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कृष्णापिथिकस दूसरे ऐप मैन का समकालीन रहा है। शिवालिक की पहाड़ियां जब उगीं तो दुनिया भर के छोटे-बड़े जीवों को यहां सुखद आशियाना मिला और यहां आकर बस गए। यह कृष्णापिथिकस भी उन्हीं में से एक रहा है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिंधु घाटी, ईरावती, त्रिपुरा और म्यांमार, नेपाल इनका विचरण इलाका हुआ करता था।
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एंथ्रोपोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के दून स्थित रीजनल आफिस से जुड़े वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. एआर सांख्यान को हरीतल यंगर में कृष्णापिथिकस के नीचे के दो दांत वर्ष 2012 में मिले। इन दांतों की कार्बन डेटिंग और दूसरी जांचें की गईं तो ये 90 लाख साल पुराने निकले। जांच में ये भी पुष्टि हुई कि ये दांत कृष्णापिथिकस के हैं। इस शोध में डॉ. सांख्यान की पेलियो रिसर्च सोसाइटी के साथ न्यूयार्क, अमेरिका के विज्ञानी डॉ. जे कैली और डॉ. टैरी हैरिसन भी जुटे।

माना जाता है कि हिमालयी श्रंखला उगने के बाद कृष्णापिथिकस कपि मानव की अधिकांश आबादी शिवालिक से सुमात्रा, थाइलैंड और दक्षिण-पूरबी एशिया की तरफ निकल गई। इस कपि मानव का मिजाज अधिक ठंडे इलाके में रहने का नहीं है।  एएसआई के पूर्व विज्ञानी और पेलियो रिसर्च सोसाइटी के प्रमुख डॉ. सांख्यान का कहना है कि कृष्णापिथिकस का विचरण पूरे शिवालिक रेंज में होता था। लक्ष्मणझूला और कालगढ़ में इसके अवशेष ढूंढे जा रहे हैं। यह कपि मानव कालांतर में गिब्बन और सियामांग में परिवर्तित हो गया। 90 लाख साल पहले इसके शिवालिक में आबाद होने की पुष्टि हो गई है।


भारतीय और अमेरिकी विज्ञानियों ने दिए नाम
कपि मानव कृष्णापिथिकस को यह नाम भारतीय विज्ञानियों ने दिया। 40 साल पहले चंडीगढ़ के प्रोफेसर आरके चौपड़ा को पहली बार कृष्णापिथिकस की आखिरी ऊपरी दाढ़ मिली थी। उसी वक्त यह नाम दिया गया। यह दाढ़ घिसी थी। इस पर संदेह किया जा रहा था। डॉ. सांख्यान को निचले दो दांत मिलने के बाद पुष्टि हुई। इसी तरह दूसरे कपि मानव रामापिथिकस, शिवापिथिकस और जागेंटोपिथिकस को ये नाम भारतीय और अमेरिकी विज्ञानियों ने दिए हैं। ये सभी प्रजातियां भारत में रहीं हैं।

सबसे हल्का कृष्णापिथिकस
कपि मानवों में सबसे हल्के वजन 15 किलो का कृष्णापिथिकस रहा है। रामापिथिकस 40 किलो, शिवापिथिकस 60 किलो और जागेंटोपिथिकस का वजन 400 किलो था। जागेंटो आठ फुट ऊंचा था। यह भी माना जाता है कि रामापिथिकस मादा और शिवापिथिकस नर कपि मानव रहा है। आदि मानव कृष्णापिथिकस गिब्बन और सियामांग में परिवर्तित हो गया। वहीं शिवापिथिकस ओरंगउटान में बदल गया। माना जाता है कि जागेंटोपिथिकस के दक्षिणी चीन में पलायन करने के बाद यह हिम मानव में बदल गया। यह भी कहा जाता है कि पत्थरों के औजार इस्तेमाल करने वाले आदि मानवों के साथ संघर्ष में जोगेंटोपिथिकस की अधिकांश आबादी समाप्त हो गई।

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