दूसरे विश्वयुद्ध में पहचान बनाने वाली खुखरी दून से भेजी जाती है इंग्लैंड, लेकिन फिर भी पहाड़ उजड़े
- मैदानी जनपदों में इकाइयां और निवेश बढ़ा, पहाड़ में घटा
- गांवों से पलायन कर गए युवा, रोजगार के लिए कारखानों की ओर किया रुख
विस्तार
दूसरे विश्वयुद्ध में पहचान बनाने वाली खुखरी आज भी देहरादून से इंग्लैंड भेजी जाती है। हॉलीवुड अंगोरा ऊन की जैकेट की मांग देशी-विदेशी पर्यटक करते हैं। बुधवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री मंत्रिमंडल की बैठक में चमोली के मंगरोली गांव में बनी बिच्छु घास (कंडाली) की जैकेट पहन कर शामिल भी हुए।
मसूरी के पास के गांवों में बन रहे उत्पाद ’सबका बाप, बकरी छाप’ के स्लोगन आपको पांच सितारा होटलों में भी देखने को मिल सकता है। यह सब प्रदेश में कुटीर उद्योगों की ताकत को सामने रखने के लिए पर्याप्त हैं। इसके बाद भी नींव मजबूत होने की बजाय बिखर गई।
बिजली, पानी, सड़क और महानगर के विकास के ढांचे को पहाड़ और गांव पर थोपने का ही शायद सबब रहा कि घर-घर और गांव-गांव का ‘कुटीर उद्योग’ भी दम तोड़ता दिख रहा है। हर गांव की पहचान घराट विदा हुआ तो गांव का युवा भी गांव की देहरी लांघ गया...। इन्हीं समस्याओं को उकेरती, संभावना की पहचान करती अमर उजाला की विनम्र कोशिश है कुटीर उद्योगों से जुड़ी यह सीरीज।
देहरादून की खुखरी भेजी जाती है इंग्लैंड में ब्रिटिश गोरखा रेजीमेंट को
परंपरागत उद्योग की ताकत का अंदाजा लगाना हो तो देहरादून से ही शुरू कर हॉलीवुड तक धमक बनाने वाले विंडलास कंपनी को सामने रखा जा सकता है। देहरादून में आज भी अगर आप गढ़ी कैंट जाएंगे, तो आपको खुखरी बनाते कई लोग मिल जाएंगे। इसी खुखरी से विंडलास ने व्यवसाय शुरू किया था। विंडलास ने इसके बाद हॉलीवुड की कई फिल्मों के लिए कस्ट्यूम बनाकर दिए। आज भी यह कंपनी इस काम में व्यस्त है।
सबका बाप, बकरी छाप...
याद कीजिए कुछ समय पहले ही प्रदेश की पशुपालन मंत्री रेखा आर्या और पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज सहित अन्य के बीच में बकरी के स्वयंवर को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ था। इस विवाद की जड़ में मसूरी के पास के कुछ गांवों के लोगों और एक समूह ग्रीन पीपुल था। इन गांवों के लोग बकरी पालते हैं, इसके दूध से पनीर और अन्य उत्पाद बनाते हैं।
इन्हीं उत्पादों की मार्केटिंग के लिए यह स्वयंवर आयोजित किया जा रहा था। अब इन गांवों के उत्पाद पांच सितारा होटलों तक पहुंचते हैं। इस काम को गांव के ही प्रशिक्षित युवा अंजाम देते हैं। इनके ब्रांड का नाम है बकरी छाप और इनका स्लोगन है ‘बकरी छाप, सबका बाप’। ग्रीन पीपुल से जुड़े लोगों के मुताबिक हर काम में यहां गांव के लोग शामिल होते हैं और हिस्सेदारी के जरिये फायदा उठाते हैं।
कुटीर उद्योगों को तरीके से प्रोत्साहन दिया जाए तो ये प्रदेश की तस्वीर बदल सकते हैं। इनको बढ़ावा देने के लिए कोशिश तो की जा रही है लेकिन प्रोत्साहन अभी पर्याप्त नहीं है। हम सभी देखते हैं कि प्रदेश के मुख्य अतिथियों को केदारनाथ से लेकर बद्रीनाथ तक के लकड़ी के मॉडल दिए जाते हैं। कुछ चुनिंदा और बेहद महंगे यह मॉडल सभी जगह उपलब्ध भी नहीं है। यह 100 रुपये में मिलने वाले मॉडल क्यों नहीं हो सकते। हथकरघा और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने की जरूरत तो है ही, लेकिन घर-घर के परंपरागत शिल्प को उकेरना भी जरूरी है। ऐपण ने पहचान तो बनाई ही है।
- पंकज गुप्ता, इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड
अब मैं 65 वर्ष का हो गया हूं। राज्य के लिए बहुत कुछ करना चाहता हूं। मेरा मानना है कि कुटीर उद्योग में संभावना ही संभावना है। सरकार प्रवासियों से बात कर रही है, जगह-जगह समिट करा रही है। प्रदेश के उद्यमियों से बात क्यों नहीं करती। हमसे बात करे, रास्ता दिखाए, कुटीर उद्योगों को जीवन अगर कोई दे सकता है तो वह पहाड़ का नागरिक और यहां का उद्यमी।
- सुधीर विंडलास , उद्यमी
प्रदेश के कुटीर उद्योग को सहारे की दरकार
रिंगाल की टोकरी से लेकर बुरांस के जूस तक मेें अपनी पहचान कायम करने वाले प्रदेश के कुटीर उद्योग को सहारे की दरकार है। यही कुटीर उद्योग है जो प्रदेश के गांवों के लिए संभावनाओं के दरवाजे खोल सकता है और गांव के युवा को गांव से बाहर जाने से रोक सकता है।
उत्तराखंड का 19 साल का सफर यह साबित कर रहा है कि प्रदेश में कुटीर उद्योगों की संख्या में इजाफा तो हुआ है लेकिन ये उद्योग गांवों और घरों की देहरी को लांघ कर शहरों में पाले और पौसे जा रहे हैं। पहाड़ों में इनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है, जबकि मैदानी जिलों में छोटे-छोटे उद्योग धंधे पनप रहे हैं।
उद्योग निदेशालय के मुताबिक वर्ष 2000 में प्रदेश में लघु स्तरीय उद्योगों की संख्या 14163 थी। जिनसे 38509 लोग रोजगार पा रहे थे। इन कुटीर और लघु उद्योगों में कुल पूंजी निवेश करीब 700 करोड़ रुपये था। राज्य गठन के 19 साल बाद इस तस्वीर में बहुत बदलाव आया। प्रदेश में इस समय कुटीर और लघु उद्योगों की संख्या करीब 60 हजार तक पहुंच गई है। करीब तीन लाख रोजगार ये सेक्टर दे रहा है। पूंजी निवेश भी करीब 13 हजार करोड़ तक पहुंच गया है।
आंकड़ों में मजबूूत लग रही यह तस्वीर जमीन पर कुछ और ही है। हालत ये है कि अधिकतर निवेश और रोजगार मैदानी जनपदों में सिमटा हुआ है। देहरादून में ही इन उद्योगों की संख्या 8392 है और पूंजी निवेश 1214 करोड़ रुपये है। इसके उलट बागेश्वर में कुल 1742 कुटीर और छोटे उद्योग हैं, जिनमें पूंजी निवेश मात्र 55 करोड़ का है। रुद्रप्रयाग में कुल 1866 उद्योगों में 96 करोड़ का निवेश है।
किसी समय उत्तराखंड मनी आर्डर इकोनामी के नाम से जाना जाता था, लेकिन हर गांव की पहचान एक घराट जरूर हुआ करता था। हर गांव में दर्जी से लेकर और दूसरे काम करने वाले लोग मौजूद रहते थे। घराट से अनाज पीसा जाता था और आपस के लेन देन में गांव की अर्थव्यवस्था चलती थी। गांव का युवा खेत में जुटता था और बाहर नहीं जाता था।
राज्य गठन के बाद से ही सड़कें गांव तक पहुंची। बिजली आई, घराट टूटे, चक्कियां पनपी। लेकिन गांव का युवा घर छोड़ मैदान की फैक्ट्रियों, होटलों की तरफ मुड़ गया। गांव के कुटीर उद्योग ठप हो कर रह गए।
कुटीर उद्योग पैकेज
राज्य गठन के बाद जिला वार लघु उद्योग का ब्योरा
जिला लघु उद्योग की संख्या रोजगार
हरिद्वार 10063 86020
देहरादून 8392 49476
ऊधमसिंह नगर 7651 63281
पौड़ी 5895 20982
टिहरी 4334 12374
नैनीताल 4216 20097
उत्तरकाशी 4028 7667
अल्मोड़ा 3875 8799
चमोली 3193 6999
पिथौरागढ़ 3036 6927
रुद्रप्रयाग 1866 4870
बागेश्वर 1742 3830
चंपावत 1532 4033
इन कुटीर उद्योगों को नहीं मिला प्रोत्साहन
पहाड़ों में रिंगाल, बांस, जूट, शाल, ऐपण, कार्पेट से संबंधित हस्तशिल्प, हैंडलूम, काष्ठ कला, कृषि, बागवानी व पशुपालन आधारित कुटीर उद्योग की तरक्की नहीं हुई है। यही वजह है कि पहाड़ों में रोजगार का विकल्प न होने के कारण पलायन से गांव खाली हो रहे हैं। इन कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने में सरकार ने रुचि नहीं दिखाई।