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अमर उजाला संवाद : निर्भया कांड के दोषियों को फांसी में देरी से अपराधियों के हौसले बुलंद 

Thu, 06 Feb 2020 11:18 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 06 Feb 2020 11:18 PM IST
सार

  • अमर उजाला संवाद में महिला वकीलों और विद्वानों ने ‘निर्भया के दोषियों को फांसी पर देरी के क्या मायने’ विषय पर रखी राय 
  • फांसी की सजा पाए दोषियों को अपील के लिए होनी चाहिए समय सीमा 

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Amar Ujala samvad: Delay in hanging culprits of Nirbhayal boosts spirits of criminals
संवाद के दौरान मौजूद लोग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

निर्भया कांड के दोषी फांसी टालने के प्रपंच भले ही कानून के दायरे में रच रहे हैं, लेकिन इनसे अन्य अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। अब आठ साल बाद एक अपराधी का घटना के वक्त नाबालिग होने का शिगूफा छोड़ा जा रहा है।

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इससे संदेश जा रहा है कि किस तरह अपराधी कानून का फायदा उठा सकते हैं? ‘निर्भया के दोषियों को फांसी पर देरी के क्या मायने’ विषय पर विचार रखने बृहस्पतिवार को अमर उजाला संवाद में आईं महिला अधिवक्ताओं और अन्य विद्वान महिलाओं ने बेबाकी से अपनी राय रखी।  
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महिला वकीलों ने कहा कि फांसी की सजा पाए अपराधियों के लिए दया याचिका दायर करने को निर्धारित समय होना चाहिए। यदि दोष सिद्ध अपराधी को उच्च न्यायालय में अपील के लिए दो माह का समय मिलता है तो फांसी जैसे मामले में भी कुछ इसी तरह से समयसीमा होनी चाहिए।
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वक्ताओं ने कहा भले ही सौ अपराधी छूट जाएं मगर एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए, इसी थीम को ध्यान में रखकर हमारा कानून गढ़ा है। लेकिन, निर्भया के मामले में तो सब साफ हो चुका है। फिर उन्हें क्यों मौका दिया जा रहा है।

संवाद में एडवोकेट अल्पना जदली, चाइल्ड हेल्पलाइन से दीपिका पंवार, लक्ष्मी बिष्ट, सुमन काला, एडवोकेट शिखा कौशल, लक्ष्मी प्रभा, शशि वर्मा, नेहा केशला, हिना, माला वालिया, दिशा अहलूवालिया, समाज सेविका साधना शर्मा, एडवोकेट मुसारत रेशमा, गोरखाली सुधार सभा से प्रभा शाह, एडवोकेट मनीषा दुसेजा और शैलजा ने विचार रखे। 

 

कानून में बदलाव हो, मगर इसे हाथ में नहीं लेना चाहिए 

न्याय प्रक्रिया में देरी पर वक्ताओं ने पुराने कानूनों को तो जिम्मेदार ठहराया ही पिछले दिनों हैदराबाद पुलिस के एनकाउंटर को भी गलत ठहराया। कहा, भले ही निर्भया के मामले में कानून से विश्वास उठ रहा है लेकिन, हैदराबाद पुलिस का कारनामा भी केवल क्षणभर के लिए संतोष देने वाला है। अदालत में कोई भी मुकदमा पुलिस की विवेचना पर आधारित होता है।

उसी पर दोषियों को सजा दी जाती है। लिहाजा, कानून में बदलाव होना चाहिए। न कानून को इस तरह हाथ में लिया जाना चाहिए। गोरखाली सुधार सभा की प्रभा शाह ने बताया कि हमारा कानून लचीला होने के कारण कई बार आंखों देखा अपराधी भी छूट जाता है। कानून को सुबूत चाहिए होते हैं और प्रभावशाली लोग उन्हें मिटाना और खरीदना दोनों जानते हैं। 
 

‘लोग क्या कहेंगे’ की सोच से बाहर निकलना होगा महिलाओं को 

पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को पूरी ताकत के साथ खड़ा होना होगा। महिलाएं आज भी लोग क्या कहेंगे...की धारणा में कैद हैं। यही कारण है कि वे खुद के लिए भी आवाज बुलंद नहीं कर पाती हैं और महिला पर अपराध को बढ़ावा मिलता है। संवाद में सीनियर एडवोकेट सरिता सेठी ने महिला अपराध के कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महिलाएं जब तक पूरी ताकत के साथ खड़ी नहीं होंगी तब तक उन पर अपराध होते रहेंगे।

दफ्तर में भले ही कोई महिला अफसर है, लेकिन घर में कई बार वह पति व अन्य घरवालों के जुल्म सहती है। अपने दफ्तर में वह न्याय करने वाली कुर्सी पर बैठी होती है मगर अपने साथ न्याय नहीं कर पाती है। वह आवाज इसलिए नहीं उठाती है कि सदियों से महिलाएं यही सोचती आ रही हैं कि आवाज उठाई तो लोग क्या कहेंगे? मौजूदा समय में महिलाओं के लिए कानून तो बने हैं, लेकिन इसकी उन्हें जानकारी न के बराबर है। जिन्हें जानकारी है वे अपनी बात को चाह कर भी नहीं उठा पाती हैं।

एडवोकेट मनीषा ने कहा कि कानून की जानकारी न होना भी अपराध का बड़ा कारण है। इसके लिए चाहिए कि विधिक जागरूकता को बढ़ावा दिया जाए। महिलाओं को कानूनी जानकारी देने के लिए सरकार और प्रशासन की ओर से कैंप, कक्षाएं आदि कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।

स्कूलों में होना चाहिए कानून का पाठ 

महिला वक्ताओं ने कहा कि कानून की जानकारी के लिए स्कूलों में भी लीगल एजुकेशन को जरूरी किया जाना चाहिए। विभिन्न कानूनों की अलग-अलग स्तर और कक्षा के हिसाब से जानकारी देनी चाहिए। इसके अलावा सरकार की ओर से जो कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं उनका प्रचार प्रसार भी अच्छे तरीके से होना चाहिए। ताकि, महिलाओं को इसके बारे में जानकारी हो सके।

इनका क्या कहना है

फांसी की सजा पाए दोषियों के पास एक निर्धारित समय होना चाहिए। वे दया याचिका दायर करते हैं तो ठीक नहीं तो फांसी दी जाए। कानूनों में बदलाव की जरूरत है। लचीले कानून का अपराधी फायदा उठाते हैं। -एडवोकेट मनीषा दुसेजा


दुख होता है जब आंखों देखा अपराधी कोर्ट से छूट जाता है। इसमें पीड़ित चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। यह कानून में कमियों के कारण होता है। पुलिस भी शुरूआती दौर में केस को मोड़ने का प्रयास करती है। -प्रभा शाह, गोरखाली सुधार सभा 

 

कानून सुबूत मांगता है। सुबूत वादी की तरफ से भी होते हैं और प्रतिवादी की तरफ से भी। इसी वजह से कानून को अंधा भी कहा जाता है। कई स्तर पर इसमें सुधार हो तो अपराधी इसका लाभ नहीं उठा सकते। -सविता सेठी, सीनियर एडवोकेट


महिलाओं को ज्यादा कानूनी मदद और जानकारी की जरूरत होती है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण इस संबंध में कैंप आदि लगा रहे हैं। महिलाओं को जब पूरी जानकारी होगी तभी वे अपराध का प्रतिकार कर सकती हैं। -एडवोकेट, लता राणा 


निर्भया के दोषियों को फांसी देने में हो रही देरी से दूसरे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। कानूनी तिकड़म से हर किसी को यह जानकारी मिल रही है कि इस देश में सजा को किस स्तर तक टाला जा सकता है। -लक्ष्मी प्रभा रावत, समाजसेवी 


पुलिस की विवेचना पर सब निर्भर करता है। ऐसे में यह किसी मुकदमे में जरूरी होता है कि विवेचना ठीक प्रकार से हो। लिहाजा, सरकार को चाहिए कि महिला अपराधों में विवेचना करने वालों को अलग से ट्रेनिंग और अन्य ड्यूटी से मुक्त रखा जाए। -एडवोकेट मुसर्रत रेशमा

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