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हिंदी हैं हम: मेरे जीवन और संस्कारों की भाषा है हिंदी: नंदकिशोर हटवाल
Fri, 11 Sep 2020 05:10 PM IST
अलका त्यागी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: अलका त्यागी
Updated Fri, 11 Sep 2020 05:10 PM IST
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हिंदी हैं हम
- फोटो : Amar Ujala
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एक शिक्षक के रूप में खुद को मैं हिंदी में बहुत सहज पाता हूं। हिंदी मेरे जीवन और संस्कारों की भाषा है। इसमें अपने विचारों और भावों को मैं प्रभावी रूप से व्यक्त कर पाता हूं। यह कहना है राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद में कार्यरत शिक्षक नंदकिशोर हटवाल का।
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एससीईआरटी में कार्यरत शिक्षक का कहना है कि सरकारी कामकाज की भाषा पूरी तरह से हिंदी होनी चाहिए। कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग किया जाना अनिवार्य होना चाहिए। उन्होंने बताया कि उनके दफ्तर में शत प्रतिशत हिंदी में कार्य होता है। अपने इस अनुभव के आधार पर वह कहते हैं कि हिंदी में कार्य किया जाना सरल सहज ही नहीं प्रभावी भी है।
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वह कहते हैं कि आजीविका, रोजगार और व्यवसाय की भाषा के रूप में हिंदी को मजबूत किया जाना जरूरी है। शिक्षक नंदकिशोर हटवाल का कहना है कि हिंदी को तकनीकी और विज्ञान की भाषा बनाए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि प्रायोगिक हिंदी को और अधिक सहज और सरल बनाए जाने की जरूरत है।
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प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष दिग्विजय सिंह चौहान के मुताबिक हिंदी में बच्चे सहज तरीके से सीखते हैं। उनका कहना है कि अपने अधिकतर काम हिंदी में करते हुए वह गौरवान्वित महसूस करते हैं। जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ के प्रदेश कोषाध्यक्ष सतीश घिल्डियाल कहते हैं कि हम भावों को जितनी सहजता से हिंदी में व्यक्त कर सकते हैं। इतनी सहायता से किसी अन्य भाषा में व्यक्त नहीं कर सकते। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हमें कामकाज में हिंदी भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज भी न्यायालय एवं बैंकों में हिंदी भाषा का प्रयोग नाम मात्र के बराबर होता है। उच्च शिक्षण संस्थानों में हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाना चाहिए और सबसे बड़ी बात हिंदी और इंग्लिश को लेकर जो हमारी मानसिकता है उसमें बदलाव होना जरूरी है। अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति गौरव का भाव जरूरी है।
उत्तराखंड माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अनिल शर्मा के मुताबिक हिंदी हमारी संस्कृति और देश की आत्मा है। यह हमारे लिए गर्व व सौभाग्य की बात है कि हमारे पास हिंदी जैसी समृद्ध भाषा है। जो दीर्घकाल से देश में पारस्परिक संपर्क की भाषा रही है। उन्होंने कहा कि हम अपनी-अपनी प्रांतीय भाषाओं की भरपूर उन्नति करें, लेकिन सारे प्रांतों की सार्वजनिक भाषा का पद राष्ट्रभाषा का सम्मान हिंदी को ही मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह हिंदी में काम करते हुए खुद को सहज महसूस करते हैं।