विकास दर की आधी भी नहीं है कृषि की विकास दर
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उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय भले ही डेढ़ लाख तक पहुंच गई हो, लेकिन हकीकत यह भी है कि सिर्फ खेती पर निर्भर रहने वाले किसानों की हालत खराब होती जा रही है।
प्रति व्यक्ति फसल से आय का हाल यह है कि पिछले पांच साल में इसमें मात्र 400 रुपये का ही इजाफा हुआ है। यह तब है जबकि प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय में करीब 54 हजार रुपये का इजाफा हुआ है। जाहिर है कि प्रदेश के विकास से किसान अछूते रह जा रहे हैं।
प्रदेश में खेती पर कई तरह के संकट मंडरा रहे हैं। अर्थ एवं संख्या निदेशालय का विश्लेषण यह साफ तौर पर जाहिर भी कर रहा है। पिछले पांच सालों में ही प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय करीब एक लाख रुपये से बढ़कर 1.54 लाख रुपये तक जा पहुंची है। वित्त विभाग के मुताबिक इसमें सर्विस सेक्टर का सबसे अधिक योगदान है। चिंताजनक यह है कि करीब दस लाख किसानों का इस आय में योगदान न के बराबर आ रहा है।
अर्थ एवं संख्या निदेशालय ने फसल से आय के आधार पर किसानों की आय का आकलन किया तो बेहद निराशाजनक तस्वीर उभर कर सामने आई है। फसल के आधार पर किसानों की प्रति व्यक्ति आय 2011-12 में मात्र 6451 रुपये थी। इस वर्ष प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 101128 रुपये आंकी गई। 2015-16 में फसल के आधार पर प्रति व्यक्ति आय 6886 रुपये आंकी गई और प्रति व्यक्ति आय 154818 पाई गई।
इस साल कृषि की विकास दर मात्र 3.52 रही
प्रदेश की विकास दर भी इस ओर इशारा कर रही है कि खेती किसानी की दशा ठीक नहीं है। 2012-13 को आधार वर्ष मानने पर प्रदेश की विकास दर 2015-16 में 7.65 आंकी गई। इसी वर्ष में कृषि की विकास दर मात्र 3.52 रही। जाहिर है कि खेती-किसानी की विकास दर प्रदेश की विकास दर की आधी भी नहीं है।
इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनोमिक ग्रोथ का एक सर्वे भी प्रदेश में खेती किसानी की गंभीर स्थिति की ओर इशारा कर रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट से जाहिर हो रहा है कि उत्तराखंड में किसानों की खेती से वार्षिक आय मात्र 30351 रुपये है और यह यह उनकी कुल आय का 54 प्रतिशत है। हिमाचल प्रदेश के किसानों के लिए यही आय करीब 35000 रुपये है और यह उनकी कुल आय का 33 प्रतिशत है।
बैंकों पर रिकवरी का भी दबाव, जद में किसान
प्रदेश में वसूली के लिए बैंक अब ऑनलाइन वसूली प्रमाण पत्र जारी करने की तैयारी कर रहे हैं। राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति के मुताबिक मार्च, 2017 में कृषि में एनपीए 729 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। 31 मार्च, 2017 तक बैंकों ने 3638 किसानों का कुल 38 करोड़ रुपये का कर्ज बट्टे खाते में डाला। कृषि में ही बैंक 31 मार्च, 2017 तक करीब 217 करेड़ रुपये की रिकवरी बता रहे हैं। जाहिर है कि एनपीए बढ़ने के साथ ही बैंकों पर रिकवरी का दबाव भी बढ़ रहा है। इधर प्रदेश सरकार आर्थिक संकट का हवाला देते हुए किसानों की कर्ज माफी से किनारा कर चुकी है। ऐसे में किसान अब बिगड़ते बाजार और बैंकों की रिकवरी के बीच भी भी झूल रहे हैं। बैंकों पर बढ़ रहे रिकवरी के इस दबाव का असर भी सीधे किसानों पर पड़ रहा है।