उत्तराखंडः आपदा के बाद नया खतरा
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विशेषज्ञों की माने तो भूख से इनके व्यवहार में बदलाव आया है। जिसमें खासकर पालतु कुत्तों के आवारा होने से इनके जंगली होने का खतरा पैदा हो गया है। प्रदेश में आपदा के एक महीने बाद भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों के हालात जस के तस बने हैं, गांवों में बुनियादी सुविधाएं दुरुस्त नहीं हो पाई है।
स्थिति यह है कि लोग गांवों को छोड़कर किराए के भवनों में रहने को मजबूर हैं। इस आपदा में उनके लगभग तेरह हजार मवेशी मारे जा चुके हैं, सात सौ घायल हैं और कई आवारा हो चुके हैं। जगह-जगह मवेशी फंसे हैं, इसमें आपदा प्रभावित ग्रामीणों के पालतू कुत्ते कोई ठोर ठिकाना न होने से आवारा हो चुके हैं।
उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जनपद के आरक्षित वन क्षेत्रों से सटे क्षेत्रों में इनके शिकारी होने का बड़ा खतरा पैदा हो गया है। ऊखीमठ ब्लॉक के ल्वाणी गांव के पूर्व प्रधान माधव कर्नाटक बताते हैं कि हालात में आज भी कोई सुधार नहीं हो पाया है।
बिजली, सड़क, दूरसंचार सेवाएं ठप हैं, त्रिजुगीनारायण, तोसी, कालीमठ, कोटमा, चौमासी, सल्या, तुलांग आदि सीमांत गांवों के लिए संपर्क मार्ग नहीं है, कई लोग किराए के भवनों में रह रहे हैं। ऐसे में जगह-जगह फंसे मवेशी बहुत कमजोर हो चुके हैं। जिनके व्यवहार में भी बदलाव आया है।
भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिक डा.सत्य कुमार बताते हैं कि आपदा के बाद से यात्रा ठप है, ऐसे में मवेशियों के लिए भी खाने, चारे की समस्या पैदा हो गई है। भूख से मवेशियों के व्यवहार में बदलाव आया होगा। इसमें खासकर आवारा कुत्ते जंगली हो जाते हैं। जो जानवरों को अपना शिकार बना सकते हैं।