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Dehradun News: अवैध रूप से पेड़ कटाने के मामले में आरोपी बरी, निचली अदालत का फैसला पलटा
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विकासनगर। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश नंदन सिंह ने अवैध पेड़ कटान और परिवहन मामले में सहसपुर के लक्ष्मीपुर चांचक निवासी तासीम को दोषमुक्त कर दिया है। न्यायालय ने निचली अदालत के 14 अक्तूबर 2025 को दिए गए दोषसिद्धि फैसले को रद्द कर दिया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार तासीम पर सात जनवरी 2011 को होरावाला आरक्षित वन क्षेत्र से साल के 19 पेड़ अवैध रूप से काटने और परिवहन करने का आरोप था। निचली अदालत ने उसे भारतीय वन अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। आरोपी ने इस फैसले को तथ्यों और साक्ष्यों के विरुद्ध बताते हुए अपील दायर की थी।
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की बहस सुनी और मूल अभिलेखों का अवलोकन किया। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि बरामद लकड़ी आरक्षित वन क्षेत्र से काटी गई थी। घटनास्थल की वीडियोग्राफी या फोटोग्राफी नहीं की गई थी। गवाहों के बयान में भी विरोधाभास थे।
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न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष कोई विश्वसनीय दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। बरामद माल को सील नहीं किया गया था और न ही उसकी बरामदगी का कोई स्पष्ट विवरण था। आरोपी को प्रतिबंधित कार्य करते हुए नहीं देखा गया था। केवल रवन्ना न होने से यह नहीं माना जा सकता कि उसने आरक्षित वन क्षेत्र से अपराध किया। इन सभी कारणों से अभियोजन का पूरा मामला संदेहपूर्ण प्रतीत हुआ।
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अभियोजन पक्ष के अनुसार तासीम पर सात जनवरी 2011 को होरावाला आरक्षित वन क्षेत्र से साल के 19 पेड़ अवैध रूप से काटने और परिवहन करने का आरोप था। निचली अदालत ने उसे भारतीय वन अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। आरोपी ने इस फैसले को तथ्यों और साक्ष्यों के विरुद्ध बताते हुए अपील दायर की थी।
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अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की बहस सुनी और मूल अभिलेखों का अवलोकन किया। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि बरामद लकड़ी आरक्षित वन क्षेत्र से काटी गई थी। घटनास्थल की वीडियोग्राफी या फोटोग्राफी नहीं की गई थी। गवाहों के बयान में भी विरोधाभास थे।
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न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष कोई विश्वसनीय दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। बरामद माल को सील नहीं किया गया था और न ही उसकी बरामदगी का कोई स्पष्ट विवरण था। आरोपी को प्रतिबंधित कार्य करते हुए नहीं देखा गया था। केवल रवन्ना न होने से यह नहीं माना जा सकता कि उसने आरक्षित वन क्षेत्र से अपराध किया। इन सभी कारणों से अभियोजन का पूरा मामला संदेहपूर्ण प्रतीत हुआ।