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Dehradun News: हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप बने समग्र विकास रणनीति
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दून विश्वविद्यालय में सह-प्रबंधन की दिशा में : सरकारी नीतियां, स्वदेशी परंपराएं और सतत विकास विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप समग्र विकास रणनीति की आवश्यकता पर बल दिया।
विधायक चौहान ने कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में विकास हस्तक्षेपों को आजीविका, पारिस्थितिकी, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को समेकित करना चाहिए, न कि केवल खंडित कल्याणकारी उपायों पर निर्भर रहना चाहिए। सामुदायिक संसाधन प्रबंधन और सामूहिक भूमि व्यवस्था जैसी अनेक आधुनिक विकास अवधारणाएं जनजातीय समाजों में पहले से विद्यमान रही हैं और समकालीन नीति-निर्माण के लिए मार्गदर्शक बन सकती हैं। विवि की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि हाल ही में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर हुए परामर्शों ने शहरी नीति विमर्श और जनजातीय समुदायों की वास्तविक जीवन स्थितियों के बीच अंतर को स्पष्ट रूप से सामने रखा है। प्रतिभागियों ने प्रदर्शित किया कि जनजातीय समाज नीति के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि सक्रिय योगदानकर्ता हैं जिनकी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां और सतत जीवन-पद्धतियां समावेशी व पर्यावरणीय संतुलन वाले विकास की दिशा दिखाती हैं। इस मौके पर डॉ. अंबेडकर चेयर, प्रो. आरपी ममगlई, योगेंद्र सिंह रावत, डॉ. लोकेश ओहरी, प्रो. देव नाथन, प्रो. बीना सकलानी, प्रो. विजय एस सहाय, डॉ. केआर नौटियाल ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में उत्तराखंड व अन्य राज्यों से आए 200 से अधिक प्रतिभागी सम्मिलित हुए।
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विधायक चौहान ने कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में विकास हस्तक्षेपों को आजीविका, पारिस्थितिकी, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को समेकित करना चाहिए, न कि केवल खंडित कल्याणकारी उपायों पर निर्भर रहना चाहिए। सामुदायिक संसाधन प्रबंधन और सामूहिक भूमि व्यवस्था जैसी अनेक आधुनिक विकास अवधारणाएं जनजातीय समाजों में पहले से विद्यमान रही हैं और समकालीन नीति-निर्माण के लिए मार्गदर्शक बन सकती हैं। विवि की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि हाल ही में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर हुए परामर्शों ने शहरी नीति विमर्श और जनजातीय समुदायों की वास्तविक जीवन स्थितियों के बीच अंतर को स्पष्ट रूप से सामने रखा है। प्रतिभागियों ने प्रदर्शित किया कि जनजातीय समाज नीति के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि सक्रिय योगदानकर्ता हैं जिनकी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां और सतत जीवन-पद्धतियां समावेशी व पर्यावरणीय संतुलन वाले विकास की दिशा दिखाती हैं। इस मौके पर डॉ. अंबेडकर चेयर, प्रो. आरपी ममगlई, योगेंद्र सिंह रावत, डॉ. लोकेश ओहरी, प्रो. देव नाथन, प्रो. बीना सकलानी, प्रो. विजय एस सहाय, डॉ. केआर नौटियाल ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में उत्तराखंड व अन्य राज्यों से आए 200 से अधिक प्रतिभागी सम्मिलित हुए।
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