चारधाम श्राइन बोर्ड: एक्ट लागू होते ही बदल जाएगी 80 साल पुरानी व्यवस्था, विरोध से पार पाना भी चुनौती
- 2004 में एनडी तिवारी सरकार के कार्यकाल में गठित की गई थी चार धाम विकास परिषद
- अपना अधिनियम न होने की वजह से सिर्फ नाम भर की ही मानी जाती है यह परिषद
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उत्तराखंड विधानसभा से मंजूरी मिलने के बाद प्रदेश में चारों धामों के संचालन की करीब 80 साल पुरानी व्यवस्था बदल जाएगी। बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के लिए 1939 में अधिनियम लाया गया था। मंत्रिमंडल ने माना कि यह अधिनियम बेहद पुराना हो गया है और यमुनोत्री, गंगोत्री की यात्रा का संचालन अलग से करना पड़ रहा है। इस वर्ष चारों धामों में करीब 36 लाख यात्री आए।
चारों धामों को एक छतरी के नीचे लाने की यह पहली कोशिश नहीं है। 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने भी इसके लिए कोशिश की थी। उस समय चारधाम विकास परिषद का गठन किया गया। अधिनियम न होने के कारण यह परिषद सिर्फ नाम भर की रह गई।
बदरीनाथ और केदारनाथ की यात्रा व्यवस्था बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति देखती है। 2002 में संशोधन कर इस कमेटी के सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। कमेटी का यमुनोत्री तथा गंगोत्री की यात्रा व्यवस्था पर कोई नियंत्रण नहीं है। यमुनोत्री और गंगोत्री की यात्रा व्यवस्था के लिए अलग से कमेटी है।
विरोध से पार पाने की भी चुनौती
चारों धामों के लिए अलग से यात्रा संचालन व्यवस्था बनाने के मामले में मंत्रिमंडल ने वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड से लेकर अन्य प्रसिद्ध मंदिरों की संचालन व्यवस्था का अध्ययन भी कराया। मंत्रिमंडल ने माना कि 1986 में बने वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के गठन के बाद से वहां की यात्रा व्यवस्था में अभूतपूर्व परिवर्तन आया।
मंदिर को मिली धनराशि से पर्याप्त विकास हुआ। बताया जाता है कि बदरीनाथ में 1939 से पहले सारा चढ़ावा रावल के पास ही जाता था। 1939 के बाद रावल के पास धार्मिक व्यवस्था के अधिकार रह गए थे। माना जा रहा है कि श्राइन बोर्ड के गठन के बाद चारों धामों की यात्रा व्यवस्था में भी बदलाव आएगा। यात्रियों को अधिक सुविधाएं दी जा सकेंगी।
श्राइन बोर्ड के गठन को मंत्रिमंडल से मंजूरी के बाद ही विरोध भी शुरू हो गया है। इसी विरोध की आशंका को देखते हुए सरकार ने शिकायतों के निपटारे के लिए दो उच्च स्तरीय समितियों के गठन को भी मंजूरी दी है।
सूत्रों के मुताबिक मंत्रिमंडल ने भी हक हकूक संरक्षित रखने पर भी जोर दिया। अब यह इस पर भी निर्भर करेगा कि प्रदेश सरकार किस तरह से हक हकूकधारियों को समझाने में कामयाब होती है।