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यहां 12 महीने रंग बदलते बाजार
Updated Thu, 06 Jul 2017 10:39 PM IST
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कौशल सिखौला
हरिद्वार।
12 महीने अपना कलेवर और रंग बदलने वाली धर्मनगरी के बाजार अब बम-बम की तैयारियों में जुट गए हैं। मेलों का यह ऐसा शहर है, जहां 12 महीनों में बाजार नए-नए रंग बदलते हैं। दुकानों का रंग-रूप ही नहीं, बिकने वाले सामान और खान-पान भी बदल जाते हैं। मौसम और महीने के हिसाब से इस तीर्थनगरी का मिजाज बदलता रहता है।
21 जुलाई तक के लिए हरिद्वार की हजारों दुकानें कांवड़ के बाजार में बदल चुकी होंगी। शिव चौदस को जल चढ़ते ही यह बाजार एक बार फिर गादली गंगा के स्नान में बदलेगा। इस स्नान पर आने वाले श्रद्धालुओं की खरीद का सामान कुछ अलग है। कांवड़ मेले में हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान का खान-पान बाजार में मिलता है। गादली गंगा पर केवल हरियाणावासियों के लिए उनकी पसंद के खान-पान दुकानों पर तैयार किए जाएंगे। लक्खी स्नानों के लिए मशहूर धर्मनगरी में हर महीने का रंग अलग है। वर्ष की शुरूआत जनवरी में होती है और वह महीना पर्वतीय यात्रियों के खान-पान और क्रय किए जाने वाले सामान से भर जाता है। मकर संक्रांति और लोहड़ी पर नियमित बाजार में भी पानीपत और लुधियाना की लोईयां जगह बना लेती हैं। कभी इस बाजार में कश्मीर की पशमीना शॉलें और हिमाचल प्रदेश की जानी मानी गर्म लोईयां आती थी। इनकी मांग विदेशों में हो जाने के कारण अब लुधियाना और पानीपत के उद्योग हरिद्वार की जरूरत को पूरी करने लगे हैं। मार्च में शारदीय कांवड़ के दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश के रंग नजर आते हैं। बैसाखी पर पंजाब के रंगों से धर्मनगरी सराबोर हो जाती है। उन दिनों पंजाबी खान-पान सभी दुकानों पर सज जाते हैं और आवासीय स्थलों को भी विशेष रूप से पंजाबियों की जरूरतों के अनुसार तैयार किया जाता है। मई और जून के महीने ऐसे महीने हैं, जिनमें पूरे देश के ही नहीं अपितु विदेश के भी पर्यटक तथा यात्री इस नगरी में पहुंचते हैं। इन महीनों में यात्रा के मद्देनजर काम आने वाला सामान बाजारों में सज जाता है।
श्राद्ध पक्ष में एक बार फिर हलवाइयों की दुकानों पर वह बनता है, जो श्राद्ध में दान के काम आए। अश्विन मास में बंगाली सीजन की शुरूआत होने पर खान-पान पूरी तरह बंगाली हो जाता है। दशहरे पर उड़ीसा और त्रिपुरा के यात्री भी खूब आते हैं और बाजार उन प्रांतों की जरूरतों के लिहाज से बदलता है। दीवाली के बाद गुजरातियों के लिए दुकानों पर मीठा भोजन बनने लगता है। शरद काल में दक्षिण भारत के चारों प्रांतों से अधिक यात्री धर्मनगरी पहुंचते हैं, परिणामस्वरूप इस नगरी में दक्षिण के मसाला डोसा और इडलियां जगह जगह बिकने लगते हैं। यहां तक के फेरी लगाकर भी इडली और वड़े बेचे जाते हैं। बहरहाल इस समय भोलेनाथ का शोर है और चारों तरफ बम-बम के बाजार सज रहे हैं। आधुनिक होते कांवड़ियों की वेशभूषा दुकानों पर सजा दी गई है।
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हरिद्वार।
12 महीने अपना कलेवर और रंग बदलने वाली धर्मनगरी के बाजार अब बम-बम की तैयारियों में जुट गए हैं। मेलों का यह ऐसा शहर है, जहां 12 महीनों में बाजार नए-नए रंग बदलते हैं। दुकानों का रंग-रूप ही नहीं, बिकने वाले सामान और खान-पान भी बदल जाते हैं। मौसम और महीने के हिसाब से इस तीर्थनगरी का मिजाज बदलता रहता है।
21 जुलाई तक के लिए हरिद्वार की हजारों दुकानें कांवड़ के बाजार में बदल चुकी होंगी। शिव चौदस को जल चढ़ते ही यह बाजार एक बार फिर गादली गंगा के स्नान में बदलेगा। इस स्नान पर आने वाले श्रद्धालुओं की खरीद का सामान कुछ अलग है। कांवड़ मेले में हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान का खान-पान बाजार में मिलता है। गादली गंगा पर केवल हरियाणावासियों के लिए उनकी पसंद के खान-पान दुकानों पर तैयार किए जाएंगे। लक्खी स्नानों के लिए मशहूर धर्मनगरी में हर महीने का रंग अलग है। वर्ष की शुरूआत जनवरी में होती है और वह महीना पर्वतीय यात्रियों के खान-पान और क्रय किए जाने वाले सामान से भर जाता है। मकर संक्रांति और लोहड़ी पर नियमित बाजार में भी पानीपत और लुधियाना की लोईयां जगह बना लेती हैं। कभी इस बाजार में कश्मीर की पशमीना शॉलें और हिमाचल प्रदेश की जानी मानी गर्म लोईयां आती थी। इनकी मांग विदेशों में हो जाने के कारण अब लुधियाना और पानीपत के उद्योग हरिद्वार की जरूरत को पूरी करने लगे हैं। मार्च में शारदीय कांवड़ के दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश के रंग नजर आते हैं। बैसाखी पर पंजाब के रंगों से धर्मनगरी सराबोर हो जाती है। उन दिनों पंजाबी खान-पान सभी दुकानों पर सज जाते हैं और आवासीय स्थलों को भी विशेष रूप से पंजाबियों की जरूरतों के अनुसार तैयार किया जाता है। मई और जून के महीने ऐसे महीने हैं, जिनमें पूरे देश के ही नहीं अपितु विदेश के भी पर्यटक तथा यात्री इस नगरी में पहुंचते हैं। इन महीनों में यात्रा के मद्देनजर काम आने वाला सामान बाजारों में सज जाता है।
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श्राद्ध पक्ष में एक बार फिर हलवाइयों की दुकानों पर वह बनता है, जो श्राद्ध में दान के काम आए। अश्विन मास में बंगाली सीजन की शुरूआत होने पर खान-पान पूरी तरह बंगाली हो जाता है। दशहरे पर उड़ीसा और त्रिपुरा के यात्री भी खूब आते हैं और बाजार उन प्रांतों की जरूरतों के लिहाज से बदलता है। दीवाली के बाद गुजरातियों के लिए दुकानों पर मीठा भोजन बनने लगता है। शरद काल में दक्षिण भारत के चारों प्रांतों से अधिक यात्री धर्मनगरी पहुंचते हैं, परिणामस्वरूप इस नगरी में दक्षिण के मसाला डोसा और इडलियां जगह जगह बिकने लगते हैं। यहां तक के फेरी लगाकर भी इडली और वड़े बेचे जाते हैं। बहरहाल इस समय भोलेनाथ का शोर है और चारों तरफ बम-बम के बाजार सज रहे हैं। आधुनिक होते कांवड़ियों की वेशभूषा दुकानों पर सजा दी गई है।
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