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बारिश से पांजणा में दो मकान जमींदोज
Updated Thu, 06 Jul 2017 10:11 PM IST
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जखोली (ब्यूरो)। भारी बरसात से पांजणा गांव में दो आवासीय मकान जमींदोज हो गए हैं। भले ही प्रभावित परिवार पहले ही अन्यत्र सुरक्षित स्थानों पर शरण ले चुके थे। बरसात के चलते गांव में कई मकान खतरे की जद में आ गए है। इन घरों में रहने वाले लोग पंचायत भवन व जीआईसी में शरण ले रहे है।
बुधवार रात्रि को हुई तेज बारिश से धीरेंद्र सिंह रौतेला व दर्शन सिंह का मकान ध्वस्त हो गया है। भू-धंसाव जोन में होने के कारण भवन स्वामी की ओर से इन मकानों को पहले ही छोड़ दिया गया था। बीते एक सप्ताह में गांव में छूटे छह मकान बारिश से ध्वस्त हो गए हैं। वहीं, गांव के नीचे हो रहे भूस्खलन से अन्य कई घरों पर दरारें पड़ रही हैं। ग्राम प्रधान त्रिलोक सिंह रौतेला ने बताया कि आसमान में बादल घिरते ही ग्रामीण घरों को छोड़कर पंचायत भवन व राजकीय इंटर कालेज के कक्षा-कक्षों में शरण ले रहे हैं। बताया कि वर्ष 2007, 2009 और 2013 में पांजणा गांव के गदेरे में बादल फटने से भारी नुकसान हुआ था। तब, से गांव के नीचे भूस्खलन थम नहीं रहा है। 148 परिवारों वाले आपदा प्रभावित गांव में अधिकांश घरों पर दरारें पड़ी है, लेकिन ग्रामीणों को आज तक न तो मुआवजा मिला और न सुरक्षा के इंतजाम हो पाए।
सर्वे तक सिमटा विस्थापन
जखोली। 2013 के बाद से पांजणा गांव का विस्थापन के लिए तीन बार भू-गर्भीय सर्वेक्षण हो चुका है। तहसील प्रशासन की ओर से सर्वे के आधार पर गांव को अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है, लेकिन विस्थापन कब होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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बुधवार रात्रि को हुई तेज बारिश से धीरेंद्र सिंह रौतेला व दर्शन सिंह का मकान ध्वस्त हो गया है। भू-धंसाव जोन में होने के कारण भवन स्वामी की ओर से इन मकानों को पहले ही छोड़ दिया गया था। बीते एक सप्ताह में गांव में छूटे छह मकान बारिश से ध्वस्त हो गए हैं। वहीं, गांव के नीचे हो रहे भूस्खलन से अन्य कई घरों पर दरारें पड़ रही हैं। ग्राम प्रधान त्रिलोक सिंह रौतेला ने बताया कि आसमान में बादल घिरते ही ग्रामीण घरों को छोड़कर पंचायत भवन व राजकीय इंटर कालेज के कक्षा-कक्षों में शरण ले रहे हैं। बताया कि वर्ष 2007, 2009 और 2013 में पांजणा गांव के गदेरे में बादल फटने से भारी नुकसान हुआ था। तब, से गांव के नीचे भूस्खलन थम नहीं रहा है। 148 परिवारों वाले आपदा प्रभावित गांव में अधिकांश घरों पर दरारें पड़ी है, लेकिन ग्रामीणों को आज तक न तो मुआवजा मिला और न सुरक्षा के इंतजाम हो पाए।
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सर्वे तक सिमटा विस्थापन
जखोली। 2013 के बाद से पांजणा गांव का विस्थापन के लिए तीन बार भू-गर्भीय सर्वेक्षण हो चुका है। तहसील प्रशासन की ओर से सर्वे के आधार पर गांव को अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है, लेकिन विस्थापन कब होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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