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देवोत्थानी एकादशी में दिखी संस्कृति की झलक
Updated Tue, 20 Nov 2018 02:07 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
ग्यारहगांव एवं हिंदाव सामाजिक सांस्कृतिक विकास समिति की ओर से सोमवार को आयोजित देवोत्थानी एकादशी में पारंपरिक संस्कृति की झलक देखने को मिली। इस मौके पर कलाकारों ने पारंपरिक झुमैलो पांडव नृत्य, केदारनृत्य, जागर आदि की प्रस्तुति दी। देवोत्थानी एकादशी का शुभ मुहूर्त रविवार दोपहर एक बजकर 34 मिनट से सोमवार दो बजकर 31 मिनट तक रहा।
कार्यक्रम का आयोजन समिति की ओर से सोमवार को अजबपुर, माता मंदिर रोड स्थित सोढ़ी मैदान में किया गया। मुख्य अतिथि समाज सेवी जगदीश प्रसाद ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर ढोल दमाऊ की धुन पर महिलाओं और पुरुषों ने लोक नृत्य प्रस्तुत किए। महिलाओं के झुमैलो गीत की प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया।
समिति के अध्यक्ष एसपी डंगवाल ने बताया कि 1980 में 11 गांव हिंदाव पट्टी और हिंदाव गांव के लोगों ने स्वास्थ्य सेवा, बिजली, पानी, सड़क जैसी विभिन्न समस्याओं के चलते पलायन करना शुरू कर दिया था। इससे गांव की पौराणिक प्रथा और संस्कृति धीरे-धीरे समाप्त होने लगी थी। संस्कृति बचाने के लिए समिति का गठन किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी संस्कृति और बोली भाषा को संजोए रखना है। कार्यक्रम में टीकाराम, दिनेश डबराल, आलोक सेमवाल, कैलाश तिवारी, विनोद नौटियाल, शूरवीर लाल, बच्चन सिंह राणा, जमुना प्रसाद, युद्धवीर सिंह नेगी, महेंद्र सिंह रावत, चिंतामणि, गोविंद सिंह निर्मल भट्ट, विजय उनियाल, लोकानंद जोशी आदि मौजूद रहे। दूसरी ओर देवोत्थानी एकादशी पर दिशा सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था की ओर से विशेष पूजा अर्चना कर प्रदेश के विकास की कामना की गई।
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दिवाली के बाद मनाया गया इगास
रोशनी का त्योहार दिवाली के बाद धूमधाम से इगास (एकादशी) का पर्व मनाया। इगास का पर्व दिवाली के 11वें दिन के बाद मनाया जाता है। इस मौके पर प्रभु शालिग्राम व तुलसी मैया का विवाह कराया गया। माना जाता है कि जिस विवाह के लिए कोई मुहूर्त न मिल रहा हो, वह इस शुभ लग्न में विवाह कर सकते हैं।
लकड़ी के गट्ठर पर आग लगाकर घुमाया सिर के ऊपर
समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम में छिल्लु (चीड़ की अति ज्वलनशील लकड़ी) के छोटे गट्ठर को एक बेल या बगलु घास की रस्सी के सहारे बांधा गया। इसके बाद श्रद्धालुओं ने लकड़ी के गट्ठर में आग लगाकर उसे सिर के ऊपर घुमाया। इसे घुमाते हुए लोग भैलो गीत गाते रहे। इसके अलावा लोग एक दूसरे को अरसा, रोटना, स्वाल, दाल के पकोड़े जैसे पारंपरिक पकवान व मिठाईयां खिलाते रहे।
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ग्यारहगांव एवं हिंदाव सामाजिक सांस्कृतिक विकास समिति की ओर से सोमवार को आयोजित देवोत्थानी एकादशी में पारंपरिक संस्कृति की झलक देखने को मिली। इस मौके पर कलाकारों ने पारंपरिक झुमैलो पांडव नृत्य, केदारनृत्य, जागर आदि की प्रस्तुति दी। देवोत्थानी एकादशी का शुभ मुहूर्त रविवार दोपहर एक बजकर 34 मिनट से सोमवार दो बजकर 31 मिनट तक रहा।
कार्यक्रम का आयोजन समिति की ओर से सोमवार को अजबपुर, माता मंदिर रोड स्थित सोढ़ी मैदान में किया गया। मुख्य अतिथि समाज सेवी जगदीश प्रसाद ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर ढोल दमाऊ की धुन पर महिलाओं और पुरुषों ने लोक नृत्य प्रस्तुत किए। महिलाओं के झुमैलो गीत की प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया।
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समिति के अध्यक्ष एसपी डंगवाल ने बताया कि 1980 में 11 गांव हिंदाव पट्टी और हिंदाव गांव के लोगों ने स्वास्थ्य सेवा, बिजली, पानी, सड़क जैसी विभिन्न समस्याओं के चलते पलायन करना शुरू कर दिया था। इससे गांव की पौराणिक प्रथा और संस्कृति धीरे-धीरे समाप्त होने लगी थी। संस्कृति बचाने के लिए समिति का गठन किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी संस्कृति और बोली भाषा को संजोए रखना है। कार्यक्रम में टीकाराम, दिनेश डबराल, आलोक सेमवाल, कैलाश तिवारी, विनोद नौटियाल, शूरवीर लाल, बच्चन सिंह राणा, जमुना प्रसाद, युद्धवीर सिंह नेगी, महेंद्र सिंह रावत, चिंतामणि, गोविंद सिंह निर्मल भट्ट, विजय उनियाल, लोकानंद जोशी आदि मौजूद रहे। दूसरी ओर देवोत्थानी एकादशी पर दिशा सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था की ओर से विशेष पूजा अर्चना कर प्रदेश के विकास की कामना की गई।
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दिवाली के बाद मनाया गया इगास
रोशनी का त्योहार दिवाली के बाद धूमधाम से इगास (एकादशी) का पर्व मनाया। इगास का पर्व दिवाली के 11वें दिन के बाद मनाया जाता है। इस मौके पर प्रभु शालिग्राम व तुलसी मैया का विवाह कराया गया। माना जाता है कि जिस विवाह के लिए कोई मुहूर्त न मिल रहा हो, वह इस शुभ लग्न में विवाह कर सकते हैं।
लकड़ी के गट्ठर पर आग लगाकर घुमाया सिर के ऊपर
समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम में छिल्लु (चीड़ की अति ज्वलनशील लकड़ी) के छोटे गट्ठर को एक बेल या बगलु घास की रस्सी के सहारे बांधा गया। इसके बाद श्रद्धालुओं ने लकड़ी के गट्ठर में आग लगाकर उसे सिर के ऊपर घुमाया। इसे घुमाते हुए लोग भैलो गीत गाते रहे। इसके अलावा लोग एक दूसरे को अरसा, रोटना, स्वाल, दाल के पकोड़े जैसे पारंपरिक पकवान व मिठाईयां खिलाते रहे।