बचा लीजिए, कहीं खत्म न हो जाएं मछलियों की 43 प्रजातियां
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उत्तराखंड में चल रही श्रीनगर जल विद्युत परियोजना से मछलियों की लगभग 43 प्रजातियां संकट में आ गई हैं। अलकनंदा घाटी में जिस पैच को मछलियों के प्रजनन के लिए उपयुक्त माना जाता है, वहां नदी का पानी सूख गया है।
यही स्थिति रही तो परियोजना बैराज कोटेश्वर से श्रीनगर तक पांच किलोमीटर के पैच में यह मछलियां दिखाई नहीं देंगी।
मालूम हो कि अलकनंदा नदी का ज्यादातर पानी श्रीनगर जल विद्युत परियोजना ने सोख लिया है। बैराज से नीचे अलकनंदा गदेरे के समान बह रही है। कई स्थानों पर नदी बिल्कुल सूख गई है।
इसके अलावा गहरे स्थानों पर पानी रुक रहा है, जहां काई उग आई है। पानी की कमी ने जलीय जीव जंतुओं पर के जीवन चक्र और पारिस्थितिकी तंत्र पर असर डाल दिया है।
जल विद्युत परियोजना से स्थिति हुई गंभीर
मछलियों पर 40 वर्षों से शोध कर रहे केंद्रीय गढ़वाल विवि के जंतु विज्ञान के प्रो. एसएन बहुगुणा बताते हैं कि मध्य हिमालय से शिवपुरी तक महाशीर (टोर), मासीन (साइजोथोरेक्स), गड़ियाल (निमिकलस), बेरलियस (फुटकवा) और पुंटियस समेत मछलियों की 43 प्रजातियां पाई जाती हैं।
यह सभी ताजे बहते पानी में रहने वाली मछलियां हैं। मछलियां उथले पानी (शैलो वाटर) में अंडे देती हैं। इसके अलावा छोटी मछलियां नदी के किनारे उथले पानी में रहती हैं। लेकिन नदी में पानी की मात्रा बहुत कम हो गई हैं। जहां मछलियां रहती थी और प्रजनन करती थी, वहां पानी नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि परियोजना के लिए पानी उस समय रोका गया है, जब मछलियों का ब्रीडिंग सीजन (प्रजनन काल) होता है। यदि मछलियों को प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण नहीं मिलेगा, तो वह अंडे नहीं देंगी।
...तो स्वादिष्ट गड़ियाल भी नहीं दिखेंगी
पहाड़ के गदेरों में रहने वाली गड़ियाल बहुत स्वादिष्ट मछली होती है। यह आकार में छह-सात सेंटीमीटर लंबी होती है। यह मछली भले गदेरों में रहती हो, लेकिन प्रजनन के लिए अलकनंदा में आती है। यह नदी किनारे आधे फीट से कम उथले पानी में अंडे देती है।
अंडों से निकले बच्चे गदेरों में वापस आ जाते हैं। कम पानी की वजह से गड़ियाल अंडे नहीं दे पा रही है। पेट में अंडे होने की वजह से यह वापस भी नहीं जा सकती है। ऐसे में इनका मरना तय है।
लार्वा और काई खाने वाली मछली भी प्रभावित
अलकनंदा में मच्छरों समेत अन्य हानिकारक कीटों का लार्वा और काई खाने वाली कार्निवोरस मछलियां बेरेलियस और पुंटियस काफी मात्रा में पाई जाती हैं। इन पर भी पानी की कमी का असर पड़ा है। यह मछलियां जीवित नहीं रही तो कीटों की संख्या बढ़ेगी। साथ ही लोग नदी का गंदा पानी पीने को मजबूर होंगे।